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राजस्थान में शिबि जनपद -Shibi Janpada in Rajasthan

November 10, 2016

राजस्थान में शिबि जनपद -


मौर्य के बढ़ते हुए प्रभाव, सिकंदर के आक्रमण और इंडो-यूनानियों के आक्रमण से बाध्य होकर कई गण जातियाँ पंजाब छोड़कर राजस्थान आई थीं। उनमें से शिवि गण के लोग मेवाड़ के नगरी नामक स्थान पर राजस्थान में स्थानान्तरित हुए। काशीप्रसाद जायसवाल का मत है कि गण जातियों का पलायन उनका स्वतंत्रता के प्रति प्रेम को दर्शाता है। यूनानी क्लासिकल लेखकों, कर्टिअस, स्ट्रेबो तथा एरियन के अनुसार चौथी शताब्दी ई.पू. में सिकंदर के विदेश लौटते समय सिब्रोई (शिबि) जनजाति द्वारा उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया गया था। एरियन के अनुसार शिबिजन के निवासी वीर और साहसी थे। उनके पास 40 हजार पदाति तथा 3000 घुड़सवार सैनिक थे। वे जंगली जानवरों की खाल पहनते थे और उनके युद्ध पद्धति विचित्र थी। युद्ध में वे गदा और लाठियों का प्रयोग करते थे। क्लासिकल लेखकों के विवरण से तो ऐसा लगता है कि शिबि जाति के लोग असभ्य तथा बर्बर थे। संभवत: यह विवरण उनके पंजाब निवास का है, जबकि राजस्थान के शिबि सुसंस्कृत और संस्कार संपन्न थे। शिबि जाति का उल्लेख ऋग्वेद में अलिनो, पक्यो, भलानसो, और विषनियो के साथ आया है जिन्हें सुदास ने पराजित किया था। ऐतरेय ब्राह्मण में शिबि राजा अमित्रतनय का उल्लेख आया है । महात्मा बुद्ध (महाजनपद युग) के समय के सोलह महाजन पदों की सूची जो अंगुत्तरनिकाय में मिलती है उसमें शिबि जनपद का उल्लेख नहीं है परन्तु महावस्तु में बुद्ध ज्ञान को जिन देशों और जनपदों में वितरित किए जाने के बात कही गई है, उनमें शिवि देश सम्मिलित है। महावस्तु की सूची में गांधार और कंबोज जनपदो का नाम न देकर उसके जगह शिबि और दर्शाण का नाम मिलता है। विनयपिटक के अनुसार शिबि देश बहुमूल्य और सुन्दर दशालो के लिये प्रसिद्ध था। अवंती नरेश चंडप्रद्योत ने शिबि देश का एक दशाले का जोड़ा वैद्य जीवक को भेंट किया था और उसने उसे भगवान् बुद्ध को अर्पित कर दिया। उम्मदंती जातक से ज्ञात होता है कि शिबियों के राज्य में 'शिबि धर्म' नामक नैतिक विधान प्रचलित था जिसका पालन करना राज्य के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य था। शिबि जातक, उम्मदंती जातक और वेसंतर जातक में शिबि देश तथा उसके राजाओं का वर्णन मिलता है।



पाणिनि ने उशीनर का बाहीक जनपद नाम से उल्लेख किया है । उसने शिबि का कहीं उल्लेख नहीं किया है। संभवत: बाद में उशीनर शिबि कहे जाने लगे महाभारत के वन पर्व में शिबि राष्ट्र और उसके राजा उशीनर का उल्लेख मिलता है। नन्दलाल डे ने महाभारत के इस शिबि राज्य को स्वात घाटी में स्थित बतलाया है। महाभारत में शिबि औशीनर की बाज हेतु बलिदान के कथा बड़ी लोकप्रिय है। फाहियान के अनुसार यह घटना उद्यान के दक्षिण या आधुनिक स्वात घाटी में घटी थी। महाभारत में बली शिबि राजा की कथा शिबि जातक में मिलती है। इस प्रकार पालि साहित्य के शिबि देश के राजधानी स्वात घाटी मानकर उसे वर्तमान सीवी (विलोचिस्तान) के आसपास माना जा सकता है या पश्चिमी पंजाब के शेरकोट के आसपास का प्रदेश और उसके राजधानी अरिथपुर मान सकते हैं। लेकिन वेसंतर जातक में जेतुतर को शिबि राज्य के राजधानी बतलाया गया है। यह बुद्धकालीन 20 बड़े नगरों में एक नगर था। वेसंतर जातक में जेतुतर को चेतरठ के मातुल नगर से 30 योजन के दूरी पर बताया गया है। नन्दलाल डे ने जेतुतर को आधुनिक चित्तौड़ से 11 मील उत्तर में स्थित नगरी नामक स्थान से अभिन्न माना है। अलबरुनी ने जिस जत्तरूर या जत्तरौर का उल्लेख किया है वह कुछ विद्वानो के अनुसार जेत्ततुर ही है। यह संभावना है कि बुद्धकालीन जेत्रातर से बिगडकर वर्तमान चित्तौड़ बना हो। नगरी में बहुत-सी ताम्र मुद्राएँ मिली है जिन पर 'मज्जिमिका य सिवि जनपदस' लिखा हुआ है। इससे स्पष्ट है कि चितौड़ के समीप मध्यमिका में भी शिबि लोगों का जनपद था। अत: जिस शिबि राज्य के राजधानी वेसंतर जातक में जेतुतर नामक नगरी बतलाई गई है, उसे भरतसिंह उपाध्याय (बुद्धकालीन भारतीय भूगोल) ने चित्तौड़ (राजस्थान) के आसपास का क्षेत्र माना है। इस प्रकार पालि साहित्य के आधार पर हमें शिबि लोगों के दो निवास स्थान मानने पड़ेंगे, एक स्वात घाटी में और दूसरा चितौड़ के आसपास। दशकुमारचरित से ज्ञात होता है शिबि जाति का एक जनपद दक्षिण में कावेरी नदी के तट पर भी स्थित था।



महाभारत में शिबियों के पंजाब से राजस्थान स्थानानान्तरित होने का प्रमाण उपलब्ध है। सभापर्व में शिबि, मालव और त्रिगर्त का एक स्थान पर मरू (राजस्थान) क्षेत्र में उल्लेख आया है। ऐसा प्रतीत होता है कि शिबि गण मध्यमिका में महात्मा बुद्ध के समय विद्यमान था। 200 ई.पू. से 200 ई. के मध्य वहाँ लोग पंजाब से आए होंगे। शिबि जाति का राजस्थान में पदार्पण सिकंदर के आक्रमण के बाद न होकर इंडो-यूनानी आक्रमण के पश्चात् होना अधिक तर्कपूर्ण है। पुष्यमित्र शुंग द्वारा इंडो-यूनानी आक्रमण के बाद शिवि जाति लगभग 187 ई.पू. मध्यमिका में आकर पूर्णतया बस गई होगी। इसकी पुष्टि उनकी मुद्राओं से होती है। प्रसिद्ध विद्वान एच.डी. सांकलिया ने नगरी से शिबिगण के 16 सिक्के एकत्रित किए थे, जिससे संकेत प्राप्त होता है कि यह क्षेत्र शिबिगण के अंतर्गत था। शिबियों की मुद्राओं का श्रीमती शोभना गोखले तथा एस.जे. मंगलम् ने अध्ययन किया था। शिबि-मुद्राओं पर सामान्य रूप से स्वस्तिक का वृषभ के साथ संयुक्त रूप से अंकन उसके चारों कोनो पर हुआ है। इन मुद्राओं पर वृक्ष का अंकन भी मिलता है। वृक्ष पूर्ण चक्र में उत्पन्न होता हुआ प्रदर्शित किया गया है। सिक्के के अग्रभाग पर अर्द्ध वर्तुलाकार उपाख्यान उत्कीर्ण है और छ: मेहराब युक्त पहाड़ के चिह्न का भी अंकन है। कुछ सिक्कों पर पहाड़ी संरचना के ऊपर अलंकरण युक्त नंदीपद है तथा पहाडी के नीचे नदी का अंकन सिक्कों के पृष्ठ भाग पर किया गया है। वृक्ष अंकन की परंपरा शिबिगण के सिक्कों में अन्य गणों के सिक्कों से भिन्न है। अन्य गणों के सिक्कों में 'ट्री इन रेलिंग' के विपरीत शिबि गण के सिक्के में वृक्ष वृत्ताकार या चक्राकार रचना के ऊपर अथवा उसमें से उत्पन्न होते हुए दिखलाया गया है।



सांकलिया को प्राप्त सिक्कों में से एक सिक्के पर वृक्ष का चित्र नहीं है तथा उसके पृष्ठ भाग पर कोई अंकन नहीं है। इस पर केवल उपाख्यान ही अंकित किया गया है। इसी प्रकार यहाँ से प्राप्त एक अन्य सिक्के के अग्रभाग पर सामान्य रूप से अंकित आठ या दस शाखाओं के वृक्ष और वृषभयुक्त स्वस्तिक के स्थान पर केवल वृक्ष की छोटी-सी शाखा ही उत्कीर्ण है। इसमें कोई वर्तुलाकार संरचना भी नहीं है। वृषभ युक्त स्वस्तिक या वृषभ युक्त क्रॉस की संख्या शिबिगण के मुद्राओं के विशेषता थी। कनिंघम छ: मेहराब युक्त पहाड को जो एक विस्तृत नंदीपद से ढका हुआ है, उसे धर्मचक्र मानते है। रोशनलाल सागर शिबिगण के प्राप्त सिक्के पर नंदीपद के आधार पर विद्वान शिबियों को शैव धर्मावलंबी मानते है। पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों को देखने से ऐसा लगता है कि मेहराब, पहाड, नदी का अंकन मानो उन्होंने शिबियों के नकल करके किया था।


शिबियो की मुद्राओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि-


(1) सभी मुद्राएँ 1.5 सेमी. से 200 से.मी. व्यास की है।

(2) इनकी मोटाई 0.1 सेमी. से 0.3 से.मी. के मध्य है।

(3) इनका भार 1.865 ग्राम से 6.442 ग्राम के मध्य है।

(4) इनके अग्रभाग पर (10 सिक्कों पर) स्वस्तिक चिह्न, 15 पर वृषभ अंकन, 16 पर वृक्ष का अंकन है। 

इन सिक्कों पर उपाख्यान शिबि, शिबिजनपदस्य, झामिकया, शिबिजा मझमिकय शिबिज उत्कीर्ण किया गया है। 13 सिक्कों पर मेहराब, पहाडी, नदी का अंकन है। एक सिक्के के पृष्ठ भाग पर रुभयुक्त स्वस्तिक चिह्न है। पाँच सिक्के दूषित या बिगड़े हुए हैं।



शिबियों के सिक्कों के भार में अंतर बतलाता है कि मुद्रा निर्माण पर कोई केन्द्रीय नियंत्रण नहीं था। कुछ सिक्के घिस गए तो भी चलन में थे जो मुद्रास्फीति फैलने का प्रमाण है। नगरी (चितौड़) से एक अभिलेख मिला था जिसे 200 ई.पू. से 150 ई.पू. का माना जाता है। इस अभिलेख के अनुसार एक पाराशर गौत्रीय महिला के पुत्र गज ने पूजा शिला-प्राकार का नारायण वाटिका में संकर्षण और वासुदेव की पूजा के लिए निर्माण करवाया था। नगरी के ही हाथी बाडा के ब्राह्मी अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रस्तर के चारों ओर दीवार का निर्माण नारायण वाटिका में संकर्षण और वासुदेव की पूजा के लिए सर्वतात जो गाजायन पाराशर गौत्रीय महिला का पुत्र था, ने बनवाया तथा उसने अश्वमेघ यज्ञ भी किया। डी.आर. भंडारकर के अनुसार उपयुक्त अभिलेख से सिद्ध होता है कि दक्षिणी राजस्थान में उन दिनों भागवत धर्म प्रचलित था।

वासुदेव कृष्ण का अब नारायण से तादात्मय स्थापित हो चुका था। इस प्रकार लगभग 200 ई.पू. से 100 ई.पू. के मध्य मध्यमिका क्षेत्र, जो शिबिगण के अधीन था, वहाँ संकर्षण और वासुदेव की पूजा प्रचलित थी। इसके पश्चात् शिबियों का विवरण वृहद् संहिता तथा दशकुमारचरित तथा दक्षिण भारत के अभिलेखों में मिलता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि 200 ई.पू. शिबियो का नगरी पर अधिकार था। बाद में वहाँ पश्चिमी क्षत्रपों के उत्थान के बाद वे लगभग 200 ई. के आसपास नगरी से भी पलायन करके दक्षिणी भारत में चले गए होंगे।

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राजस्थान में आर्जुंनायन, राजन्य, आभीर, शूद्र, उदिहिक एवं शाल्व गण -

November 08, 2016

 


प्राचीन काल में दो प्रकार के राज्य कहे गए हैं। एक राजाधीन और दूसरा गणाधीन। राजाधीन को एकाधीन भी कहते थे। जहाँ गण या अनेक व्यक्तियों का शासन होता था, वे ही गणाधीन राज्य कहलाते थे। इस विशेष अर्थ में पाणिनि की व्याख्या स्पष्ट और सुनिश्चित है। उन्होंने 'गण' को 'संघ' का पर्याय कहा है (संघोद्धौ गणप्रशंसयो:, अष्टाध्यायी 3,3,86)। प्राचीन संस्कृत साहित्य से ज्ञात होता है कि पाणिनि व बुद्ध-काल पूर्व, अनेक गणराज्य थे। तिरहुत से लेकर कपिलवस्तु तक गणराज्यों का एक छोटा सा गुच्छा गंगा से तराई तक फैला हुआ था। बुद्ध, शाक्यगण में उत्पन्न हुए थे। लिच्छवियों का गणराज्य इनमें सबसे शक्तिशाली था, उसकी राजधानी वैशाली थी। गणसंघ (संस्कृत: गणसङ्घ, समूह की सभा) या गणराज्य (समानता की सरकार), प्राचीन भारत के वे अनेक गणतांत्रिक अथवा अल्पतंत्रिक जनपद या राज्य थे जिनका बोध अनेक प्राचीन साहित्यों में पाया जाता है। कई बौद्ध, हिन्दू और अन्य संस्कृत साहित्यों में इनका उल्लेख है।

ये गणसंघ साधारणतः बड़े राजतंत्रों के सीमांतों पर अवस्थित हुआ करते थे। सामान्यतः इन का राजनैतिक संरचना किसी विशेष कुल या गोत्र की अल्पतंत्र (उदाहरण: शाक्य गणराज्य) या अनेक गोत्रों के महासंघ के रूप की हुआ करती थी (उदाहरण: वज्जि या वृजि - यह आठ गणतांत्रिक कुलों का संघ था)।
गण के निर्माण की इकाई 'कुल' थी। प्रत्येक कुल का एक-एक व्यक्ति गणसभा का सदस्य होता था। उसे 'कुलवृद्ध' या पाणिनि के अनुसार 'गोत्र' कहते थे। उसी की संज्ञा वंश्य भी थी। प्राय: ये राजन्य या क्षत्रिय जाति के ही व्यक्ति होते थे। ऐसे कुलों की संख्या प्रत्येक गण में परंपरा से नियत थी, जैसे लिच्छवी-गण के संगठन में 7707 कुटुंब या कुल सम्मिलित थे। उनके प्रत्येक कुलवृद्ध की संघीय उपाधि 'राजा' होती थी। सभापर्व में गणाधीन और राजाधीन शासन का विवेचन करते हुए स्पष्ट कहा है कि साम्राज्य शासन में सत्ता एक व्यक्ति के हाथ में रहती है। (साम्राज्यशब्दों हि कृत्स्नभाक्) किंतु गण शासन में प्रत्येक परिवार में एक-एक राजा होता है। (गृहे गृहेहि राजान: स्वस्य स्वस्य प्रियंकरा:, सभापर्व, 14,2)। दल का नेता परमवग्र्य कहा जाता था।
गणसभा में गण के समस्त प्रतिनिधियों को सम्मिलित होने का अधिकार था किंतु सदस्यों की संख्या कई सहस्र तक होती थी, अतएव विशेष अवसरों को छोड़कर प्राय: उपस्थिति परिमित ही रहती थी। शासन के लिये अंतरंग अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। किंतु नियम निर्माण का पूरा दायित्व गणसभा पर ही था। गणसभा में नियमानुसार प्रस्ताव (ज्ञप्ति) रखा जाता था। उसकी तीन वाचना होती थी और शलाकाओं द्वारा मतदान किया जाता था। इस सभा में राजनीतिक प्रश्नों के अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के सामाजिक, व्यावहारिक और धार्मिक प्रश्न भी विचारार्थ आते रहते थे। उस समय की राज्य सभाओं की प्राय: ऐसे ही लचीली पद्धति थी।

आर्जुंनायन गण जाति-



आर्जुंनायन भी एक प्राचीन गण जाति थी। उनका पाणिनि के अष्टाध्यायी, पतंजलि के महाभाष्य तथा महाभारत में उल्लेख मिलता है। गण पाठ में उनका उल्लेख राजन्य के साथ किया गया है। ऐसा माना जाता है कि आर्जुंनायन एक नवीन समुदाय था और उसके स्थापना शुंगो के बाद हुई थी। शकों और कुषाणों पराजित करने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। समुद्रगुप्त के प्रयाग-प्रशस्ति में उनका उल्लेख गुज साम्राज्य के सीमान्त क्षेत्र के निवासियों के सन्दर्भ में आता है। इस प्रकार यौधेय 380 ई. तक वर्तमान थे । उन्होंने 100 ई.पू. के आसपास अल्प मात्रा में सिक्के चलाए थे। अंतत: वे राजपूताना में निवास करने लगे थे । इनका निवास स्थान आगरा और मथुरा के पश्चिमी भाग में भरतपुर और अलवर क्षेत्र में था। वे स्वयं को पांडव राजकुमार अर्जुन का वंशज मानते थे। पाणिनि के अष्टाध्यायी में आर्जुनको का उल्लेख मिलता है जो वासुदेव के उपासक थे अत: उन्हें वासुदेवक कहा जाता था। डी.सी. शुक्ल के अनुसार आर्जुंनायन तथा प्रयाग-प्रशस्ति के आर्जुन संभवत: प्राचीन आर्जुनको की शाखा थी। बुद्धप्रकाश का मत है कि आर्जुंनायन सीथियन जाति से संबंधित थे। दशरथ शर्मा के अनुसार उन्होंने शकों तथा कुषाणों के विरुद्ध मालवों से मिलकर संघर्ष किया था। इनके मुद्राएँ धातु निर्मित है। उन पर आर्जुनायना जय अंकित है जिसका तात्पर्य है आर्जुंनायनो की जय हो। ये मुद्राएँ उत्तर क्षत्रपों, यौधेयो, औदश्वरों तथा राजन्यों के सिक्के जैसे है तथा उन पर ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है। आर्जुंनायनो की मुद्राओं पर एक खड़ी हुई आकृति तथा कूबडबवाला वृषभ, हाथी तथा ऊँट का अंकन प्रमुख रूप से है। मेक्रिन्डल का मत है कि यूनानी लेखकों ने जिस अगलसी या अगलसोई जाति का उल्लेख किया है वे अर्जुनायन ही थे।

राजन्य –



राजन्य एक प्राचीन जनपद था। उनका उल्लेख पाणिनि के अष्टाध्यायी, पंतजलि के महाभाष्य और महाभारत में प्राप्त होता है । पाणिनि के अनुसार अंधकवृष्णियों के दो राज्य थे। काशिका के अनुसार राजन्य ऐसे परिवारों के नेता थे जो शासन करने हेतु चिह्नित किए गए थे। हम जानते है कि अंधकवृष्णि एक संघ था तथा इस संघ में कार्यपालिका की शक्ति दो राजन्यों में निहित थी। इनका विधिवत चुनाव होता था। इन संघों में गण व राजन्य दोनों के नाम से सिक्के ढाले जाते थे। उनके कुछ सिक्कों पर केवल राजन्य नाम ही मिलता है। स्मिथ ने इनके सिक्कों के व्याख्या करते हुए उन्हें क्षत्रिय देश के सिक्के माना था जबकि काशीप्रसाद जायसवाल का मत था कि राजन्य एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई थे। उनकी मुद्राएँ 200 से 100 ई.पू. के मध्य जारी के गई थी। स्मिथ ने राजन्यों का क्षेत्र मथुरा, भरतपुर तथा पूर्व राजपूताना स्वीकार किया था। काशीप्रसाद जायसवाल को उनके सिक्के होशियारपुर जिले के मनसवाल से प्राप्त हुए थे । इसलिए उन्होंने होशियारपुर उनका मूल निवास स्थान माना है। राजन्यों के मुद्राओं तथा मथुरा के उत्तरी शकों के मुद्राओं में काफी समानता है। उन पर ब्राह्मी तथा खरोष्ठी में लेख उत्कीर्ण है। सिक्कों पर एक मानव आकृति अंकित है, जो शायद कोई देवता है, जिसका दायाँ हाथ ऊपर उठा हुआ है। इन पर खरोष्ठी में ‘राजन जनपदस’ उत्कीर्ण है। उनके इस प्रकार के सिक्कों पर कूबडवाला बैल अंकित है एवं उन पर ब्राह्मी लेख उत्कीर्ण है। इसके अलावा उनके मुद्राओं पर वृक्ष एवं चीते का अंकन भी मिलता है। डी.सी शुक्ल का मत है कि राजन्य शुंगकाल में उत्तरी और उत्तरी पश्चिमी राजस्थान आए थे।


आभीर –



शुंग कुषाण काल में जिन गणों का उत्कर्ष हुआ, उनमें आभीर गण भी प्रसिद्ध है। आभीरों के उत्पत्ति के संबंध में विवाद है। कुछ विद्वान उन्हें विदेशी उत्पत्ति का मानते है। वे पाँचवी शती ई.पू. के आसपास पंजाब से निर्वासित हो गए थे तथा वहाँ से पश्चिमी, मध्य तथा दक्षिणी भारत चले गए। बुद्धप्रकाश के अनुसार आभीरों का संबंध पश्चिमी एशिया के अपिरू नामक स्थान से था। महाभारत में भी आभीरों का उल्लेख मिलता है। इस विवरण में कहा गया है कि आभीरों के अपवित्र स्पर्श से सरस्वती नदी विनशन नामक स्थान पर लुप्त हो गई थी । इसका अर्थ यह लिया जाता है कि कुरुक्षेत्र के आसपास कुरुओं के शक्ति क्षीण हो गई थी। महाभारत के अनुसार आभीरों ने अर्जुन को जब वह महाभारत के युद्ध के पश्चात् द्वारिका लौट रहा था, पराजित किया था। पुराणों में आभीरों को चतुर, म्लेच्छ तथा दस्यु की तरह बताया गया है। परवर्ती काल में आभीर दक्षिणी पश्चिमी राजस्थान में अवस्थित हो गए इसकी सूचना यूनानी लेखकों से भी प्राप्त होती है।

टॉलेमी ने आभीरों का वर्णन अबीरिया नाम से किया है, जिन्हें सामान्य भाषा में अहीर कहा जाता है। अभिलेखीय प्रमाणों के अनुसार वे पश्चिमी भारत में शासन करते थे, इन्होने प्रतिहारों पर आक्रमण किया था। आभीरों का मंडोर के कक्कुक से 861 ई. में युद्ध हुआ था। कक्कुक ने उन्हें पराजित किया था। आभीरों पर विजय के उपलक्ष्य में घंटियाला में स्तंभ स्थापित किया गया था । मार्कन्डेय पुराण में आभीरों को दक्षिण भारत का निवासी कहा गया है। हेमचन्द्र रायचौधरी के अनुसार वे उत्तरी महाराष्ट्र में शासक थे।


शूद्रगण -


यहाँ शूद्र अथवा शूद्रयाण का तात्पर्य वर्ण व्यवस्था के चतुर्थ वर्ण से भिन्न है। सिकंदर ने जब भारत पर आक्रमण किया तब यह उत्तरी पश्चिमी भारत की प्रमुख जनजाति थी। यूनानी लेखकों ने इसका विवरण सोग्दी, सोद्र, सोग्द्री, सोगदोई नाम से किया है। इसको मस्सनोई से भी संबंधित किया जाता है। संस्कृत-साहित्य में उनका नाम आभीरों के विवरण के साथ आया है। महाभारत के अनुसार शूद्रों और आभीरों के क्षेत्र में सरस्वती विलुप्त हो गई थी। पुराणों में शूद्रों को उदिच्च्य निवासी कहा गया है। संभवत: उनका प्रारंभिक मूल निवास उत्तरी-पश्चिमी भारत में था। वायुपुराण, कूर्म पुराण तथा ब्रह्माण्ड पुराण से भी यही सूचना मिलती है। अर्थवेद में एक शूद्र स्त्री का मूजवंत तथा बाद्दीलक के साथ वर्णन मिलता है। सभी विवरणो में शूद्रों का संबंध उत्तरी-पश्चिमी भारत से बतलाया गया है। यूनानी लेखक डायोडोरस के अनुसार सिकंदर ने साद्रई गण में अलेक्जेंड्रिया नामक नगर को स्थापित किया था एवं उस नगर में 10,000 व्यक्तियों को बसाया गया था। संभवत: किसी समय इस गण के निवासी राजस्थान में पलायन करके आए होंगे।

उदिहिक जनपद

यह जनपद राजन्य जनपद से अधिक दूर नहीं था । वराहमिहिर ने उन्हें मध्यदेश निवासी माना है। अलबरूनी ने उन्हें भरतपुर के निकट बजाना का मूल निवासी कह कर पुकारा है। कुछ मुद्राएँ जिन पर उदिहिक तथा सूर्यमित्रस नाम उत्कीर्ण है, प्राप्त हुई है। संभवत: उदिहिक जनपद के मुद्राएँ प्रथम शती ई.पू. के मध्य में कभी जारी की गई थी। अत: स्पष्ट है कि उदिहिक जनपद शुंगकाल में अवतीर्ण हुआ था ।

शाल्व जनपद


राजस्थान में प्राचीन शाल जाति का भी विभिन्न स्थानों पर शासन था। महाभारत में शाल्वपुत्र के चर्चा मिलती है। आधुनिक अलवर उसी का बिगड़ा हुआ स्वरूप है । शाल्व जाति मत्स्य के उत्तर में बीकानेर में निवास करती थी। इसी प्रकार उत्तमभद्र जिन्होंने शक सेनापति उषवदात्त से संघर्ष किया था, इसी परिवार का अंग था, जिनका निवास स्थल बीकानेर राज्य के पूर्वी भाग में स्थित भादरा को माना जाता है। इनके पश्चिम में सार्वसेनी या शाल्वसेनी रहते थे। काशिका में उन्हें शुष्क क्षेत्र का निवासी कहा गया है। डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार अरावली के उत्तर पश्चिम में भूलिंग जाति के लोग रहते थे, वे भी संभवत: शाल्व की ही शाखा थे। शाल्व का अपने समय में राजस्थान के बडे भू-भाग पर प्रभाव था।

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राजस्थान में यौधेय गण का ऐतिहासिक विवरण –

November 06, 2016

राजस्थान में यौधेय-गण – 



मालवों की तरह यौधेय भी एक स्वतंत्रता प्रिय जाति थी। पाणिनि की अष्टाध्यायी के अनुसार यौधेय एक कुलीन तंत्रीय गण था। इस आधार पर यौधेयो की प्राचीनता छठी शताब्दी ई. पू तक सिद्ध होती है। पाणिनि ने यौधेयो का उल्लेख त्रिगंता के साथ किया है तथा लिखा है कि आयुध जीवी संघ थे अर्थात यह संघ आयुधों पर निर्भर था। पुराणों में उन्हें उशीनरों का उत्तराधिकारी बताया गया है। पर्जीटर के अनुसार उशीनर ने पंजाब में कई जातियों को बसाया था। वायुपुराण और विष्णु पुराण में यौधेयो का उशीनरों के संदर्भ में उल्लेख मिलता है। मजूमदार तथा पूसालकर के अनुसार यौधेयों ‘योध’ शब्द से बना है। महाभारत में यौधेयों युधिष्ठिर का पुत्र बतलाया गया है। इस प्रकार वे युधिष्ठिर की संतान थे। बुद्धप्रकाश इस मत के समर्थक है जबकि स्वामी ओमानन्द ने इस मत को भ्रांतिपूर्ण बतलाया है। उनका विचार है कि महाभारत में द्रोण एवं कर्ण पर्व में अर्जुन द्वारा यौधेयो को पराजित करने का उल्लेख आता है। साथ ही उन्हें युधिष्ठिर को कर देने वाला भी कहा गया है। यौधेयों का उल्लेख पुराण के अलावा शकटायन व्याकरण, जैमिनीय ब्राह्मण में भी मिलता है। जैमिनीय ब्राह्मण में यौधेयों राजा शैव्य पुण्यकेश द्वारा यज्ञ करने का विवरण मिलता है।


समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति तथा रुद्रदामा प्रथम के जूनागढ़ अभिलेख तथा नवीं शताब्दी के सोमदेव सूरि के ग्रन्थ यशस तिलक चम्पू महाकाव्य में यौधेयो की चर्चा मिलती है। दसवीं शताब्दी के अपभ्रंश ग्रंथों में भी यौधेयो का वर्णन आता है। इस प्रकार यौधेयो गण जाति का 600 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक का निरंतर विवरण मिलता है। एरियन के अनुसार जब सिकंदर व्यास नदी पर पहुँचा तो उसे व्यास नदी के पार एक उपजाऊ देश की जानकारी मिली जहाँ के लोग साहसी और योद्धा थे। जायसवाल के अनुसार एरियन द्वारा जिस जाति का विवरण दिया गया है वह यौधेय जाति थी। यौधेयो का राज्य सहारनपुर पश्चिमी उत्तरप्रदेश तक विस्तृत था जहाँ से उनकी मुद्राएँ मिली है। यौधेयो का साम्राज्य पूर्व की ओर मगध साम्राज्य की सीमा तक फैला हुआ था। सिकंदर के आक्रमण के समय कुछ गणों का नाम न मिलने का कारण यह था कि वह ऐसे कई गणों को जीत भी नहीं पाया था। यौधेयो ने सिकंदर के आक्रमण का सामना नहीं किया था इसलिए यूनानी लेखकों ने उनका उल्लेख नहीं किया है। संभवत: चन्द्रगुप्त मौर्य तथा अशोक के समय यौधेयो से उनके सच मैत्रीपूर्ण रहे होंगे। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में गणों के साथ संधि करने का उल्लेख किया है। समुद्रगुप्त की ‘प्रयाग प्रशस्ति ‘ में यौधयों का उल्लेख सम्राट को संतुष्ट करने वाले गणों के साथ हुआ है.

यौधेय शुंगकाल में विशेष रूप से अवतरित हुए। मालव-यौधेय गण ऐसे थे जो संभवत: मौर्य शुंग काल में भी जीवित रहे और शक-कुषाणों से भी संघर्ष करके अपना अस्तित्व बनाए रखा। अ.स. अल्तेकर के अनुसार यौधेयो का शासन का विस्तार तथा क्षेत्र पूर्व में सहारनपुर से पश्चिम में बहावलपुर तक तथा उत्तर पश्चिम में लुधियाना से दक्षिण पूर्व में दिल्ली तक था जहाँ से उनकी मुद्राएँ मिली है। यौधेय तीन गणों का एक संघ था। इनमें से एक की राजधानी पंजाब में रोहतक, दूसरा गण उत्तरी पांचाल में था जो बहु धान्यक कहा जाता था तथा तृतीय गण उत्तरी राजपूताना का क्षेत्र था। आठवीं सदी के महाकवि स्वयंभू का विचार था कि मरुभूमि के निकट शूरसेन यौधेयो का ही भाग क्षेत्र था। जायसवाल का मत है कि सतलज के किनारे पर रहने वाले जोहिया राजपूत यौधेयो से ही संबंधित थे। कंनिघम ने यौधेयो का मूल राज्य जोहियाबार माना था जो मुल्तान जिले में स्थित था। भावलपुर रियासत से मुल्तान तक फैला एक इलाका जोहियावार कहा जाता था। यौधेयो की कांस्य-ताम्र धातु मुद्राएँ बहुधान्यक से मिली है जिन पर "यौधेयोनां बहुधान्यके" या "बहु धन यौधेयो" लिखा है। इनकी एक मुद्रा पर "यौधेयोनां भूधान्यके" लेख उत्कीर्ण है। राजस्थान में यौधेयो का विस्तार बीकानेर राज्य के उत्तरी प्रदेश गंगानगर आदि पर बतलाया जाता है। संभवत: यौधेयो का वर्चस्व द्वितीय शताब्दी ई. पू. से समुद्रगुप्त के राज्यकाल तक बना रहा। सांचों में ढली हुई उनकी मुद्राएँ रोहतक, हरियाणा से प्राप्त हुई है जिन पर बीरबल साहनी ने पूरा ग्रन्थ ही लिख डाला था।

यौधेयो को समुद्रगुप्त से पूर्व शकों से पराजित होना पडा था। उस समय भी वे उत्तरी राजस्थान में राज्य कर रहे थे। लेकिन बाद में कुषाणों ने अपने राज्य का विस्तार कर लिया, जब यौधेयो का क्षेत्र उत्तरी राजस्थान उनके हाथ से चला गया। द्वितीय शती ई. से राजस्थान के सूरतगढ़ और हनुमानगढ़ में कुषाण मुद्राएँ प्राप्त होने लगती है। उनके सिक्के रंगमहल तथा सांभर से भी मिले है । सुई विहार अभिलेख से ज्ञात होता है कि कुषाणों का उत्तरी राजस्थान पर अधिकार था। रुद्रदामा प्रथम के उत्कर्ष के बाद कुषाण राजस्थान पर अपना प्रभुत्व बनाए न रख सके। रुद्रदामा प्रथम की विजयों के फलस्वरुप स्वतंत्रता प्रेमी यौधेयो को कुचल दिया गया और उन्हें अपने अधीन कर लिया लेकिन उन्होंने द्वितीय शताब्दी ई. में अपनी स्वतंत्रता के लिये फिर प्रयास किया जिसमें वे सफल रहे उन्होंने कुषाणों को सतलज के पार भगा दिया।

अल्तेकर का मत है कि कुषाणकाल तक यौधेय राजतंत्र शासन पद्धति अपना चुके थे। वे वीरता में अग्रणी और कार्तिकेय के उपासक थे। महाभारत में उन्हें "मत्त मयूरक" कहा गया है। कुषाणों के पतन के बाद उनका फिर उत्तरी राजस्थान पर अधिकार हो गया था। समुद्रगुप्त के राज्यकाल तक बे अपने अस्तित्व को बनाए रहे। यौधेयो का एक अभिलेख राजस्थान के भरतपुर जिले से प्राप्त हुआ है जिससे ज्ञात होता है कि वे अपने नेता का चुनाव करते थे। इस लेख को अभिलेखशास्त्री गुप्तकाल का मानते है। इस लेख में यौधेय गण के नेता के लिए महाराज तथा महासेनापति उपाधियों का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार यौधेयो का शासन शुंगकाल से चौथी शताब्दी ईस्वी तक पूर्वी पंजाब, सतलज तथा यमुना नदी के मध्य के क्षेत्र, पश्चिम उत्तर प्रदेश एवं उत्तरी राजस्थान तक विस्तृत था। इनकी मुद्रा-निधियां दिल्ली एवं करनाल के मध्य स्थित सोनपत से प्राप्त हुई है । संभवत: यौधेय राजस्थान में द्वितीय शताब्दी ईस्वी के मध्य तक अवश्य आ गए थे। उनकी मुद्राएँ तीन प्रकार की है -

प्रथम - शुंगकालीन मुद्राएँ जिन पर चलता हुआ हाथी तथा वृषभ अंकित है 

द्वितीय - वे मुद्राएँ जिन पर कार्तिकेय अंकित है।

तृतीय- वे मुद्राएँ जिन पर यौधेयो गणस्य जय: उत्कीर्ण है।

इन पर एक योद्धा का अंकन है, जो हाथ में भाला लिए हुए है, इसकी त्रिभंगी मुद्रा है। कुछ सिक्कों पर द्वि तथा त्रि लिखा है जिसका तात्पर्य कुषाणों से दो या तीन बार संघर्ष करना माना जाता है। अलेक्जेंडर को उनका मुद्रांक मिला था जिस पर ''यौधेयग़ेनां जय मन्त्रधराणाम" उत्कीर्ण था। मुद्रांक के नीचे चलता हुआ नंदी अंकित है। अग्रोहा से भी यौधेयो का मुद्रांक मिला है।

यौधेयों की मुद्राओं को कालक्रमानुसार मुख्यतः तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है -

1. वृषभ तथा गज प्रकार की मुद्रा

2. कार्तिकेय के साथ ब्राह्मणस्य देवस्य अंकित मुद्रा

3. कुषाण अनुकरण पर निर्मित मुद्रा 

प्रथम प्रकार की मुद्राएँ ताम्र निर्मित हैं जिनका निर्माण काल 200 ईसा पूर्व के लगभग माना जाता है। इस प्रकार की मुद्रा के अग्रभाग पर वृषभ की आकृति है और उसके सम्मुख स्तम्भ की आकृति है। साथ में ब्राह्मी लिपि में ’यौधेयानां बहुधान्यके’ [बहुधन्यक] लेख अंकित है जो सूचित करता है कि यह गणराज्य आर्थिक दृष्टि से समृद्धिशाली था। मुद्रा के पृष्ठ भाग पर गज तथा नन्दिपद का चिह्न अंकित है। इसी वर्ग की अन्य प्रकार की मुद्रा पर ब्राह्मी लिपि में लेख अंकित है जिसके बीच के कुछ अक्षर अस्पष्ट हैं। सुप्रसिद्ध मुद्राविद रोजर्स ने उसे ‘भूपधनुष’ पढ़ा है. जॉन एलन ने इसे ‘बहुधनके' पढ़कर इसका संस्कृत रूप ‘बहुधान्यक’ बतलाया है। महाभारत में पश्चिम की ओर नकुल की विजय के प्रसंग में पंजाब के उर्वर प्रदेश को मानना अत्यंत समीचीन है। द्वितीय प्रकार की मुद्राएँ रजत निर्मित हैं। उक्त मुद्राएँ लगभग प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में निर्मित हुईं। इनके अग्रभाग में षडानन कार्तिकेय को कमल पर खड़ा दिखाया गया है तथा ब्राह्मी लिपि में ‘यौधेयानाम भगवत स्वामिनो ब्राह्मणस्य देवस्य ‘लेख लिखा मिलता है। इसके पृष्ठ भाग में सुमेरु पर्वत, बोधि वृक्ष एवं नन्दिपद चिह्न अंकित हैअंतिम प्रकार की मुद्राएँ कुषाण शासकों के अनुकरण के आधार पर ताम्र निर्मित हैंइनका समय लगभग तृतीय एवं चतुर्थ शताब्दी ईसवी है मुद्रा के अग्रभाग पर युद्ध देवता कार्तिकेय की आकृति और बायीं ओर मयूर की आकृति है ब्राह्मी लिपि में ‘यौधेय गणस्य जयः’ अथवा ‘यौधेयानाम गणस्य जयः’ लेख अंकित है पृष्ठ भाग पर बिन्दुमाला के बीच वाममुखी कटि विन्यस्त देवसेना (कार्तिकेय पत्नी) का चित्रण हुआ है 
पुराणों में यौधेयो का राजतंत्र की तरह वर्णन किया गया है लेकिन कालांतर में यह कुलीन तंत्र में परिवर्तित हो गया तथा इस गण में 5000 सदस्यों की सभा होती थी। जबकि उनके भरतपुर अभिलेख तथा अग्रोहा मुद्रांक लेख से संकेत मिलता है कि उनके नेता का चुनाव होता था। शासन व्यवस्था गणतांत्रिक थी। कहा जाता है कि यौधेयो ने युद्धक प्रकार के सिक्के कुषाण मुद्रा माला से प्रभावित होकर जारी किए थे। बी. स्मिथ का मत है कि यौधेयो के युद्धक सिक्के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की उत्तरी विजय पूर्ण होने तक अर्थात् 360 ई. तक विद्यमान थे। अत: निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि यौधेयो का राजनीतिक वर्चस्व चौथी शताब्दी ईस्वी तक विद्यमान रहा। विजयगढ लेख समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति तथा अन्य परवर्ती साहित्य से यौधेयो के अस्तित्व की पूर्ण जानकारी मिलती है।


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राजस्थान की मालव गणजाति का ऐतिहासिक विवरण -

November 06, 2016

राजस्थान की मालव गणजाति का ऐतिहासिक विवरण -

नान्दसा यूप



मालव जाति ने प्राचीन भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इस जाति का मूल निवास स्थान पंजाब था, वहाँ से इसका प्रसार उत्तरी भारत, राजस्थान, मध्य भारत, लाट देश, वर्तमान में भड़ौच, कच्छ, बड़नगर तथा अहमदाबाद में हुआ और अंत में मालवा में इस जाति ने अपने राज्य की स्थापना की। मालवों का सर्वप्रथम उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में मिलता है। मालवों ने अपने गणस्वरुप को 600 ई.पू. से 400 ई. तक बनाए रखा। समुद्रगुप्त द्वारा पराजित मालवों ने अब गणशासन पद्दति को त्याग कर एकतंत्र को स्वीकार कर लिया। उन्होंने दशपुर- मध्यमिका (चितौड़) क्षेत्र में औलिकर वंश के नाम से शासन किया। पाणिनि के अनुसार मालव और क्षुद्रक वाहिक देश के दो प्रसिद्ध गणराज्य थे। दोनों की राजनीतिक सत्ता और पृथक भौगोलिक स्थिति थी। युद्ध के समय ये दोनों गण मिलकर साथ लड़ते थे। इस संयुक्त सेना की संज्ञा 'क्षौद्रक-मालवी' थी । सिकंदर के आक्रमण के समय मालव-क्षुद्रक गणों की सेना को साथ-साथ लडना था परन्तु सेनापति के चुनाव को लेकर उनमें मतभेद उत्पन्न हो गया। डायोडोरेस के अनुसार उन्होंने शत्रु का अलग-अलग मुकाबला किया। पाणिनि ने दोनों जातियों को "आयधुजीवी संघ" कहकर पुकारा है। उन दिनों वे समृद्ध दशा में थे भण्डारकर के अनुसार यूनानी लेखकों के द्वारा वर्णित "ओक्सिद्रकाई" क्षुद्रक ही थे। पतंजलि के महाभाष्य तथा जैन ग्रन्थ भगवतीसूत्र में मालवों का उल्लेख मिलता है। सिकंदर के आक्रमण के पूर्वी पंजाब में स्थित थे। स्मिथ के अनुसार मालव झेलम और चिनाब के संगम के निचले भाग में निवास करते थे। मैक्रिन्डल का मत है कि चिनाब और रावी के मध्य का मैदानी भू-भाग जो सिन्धु और चिनाब के संगम तक फैला हुआ था, मालवों के अधीन था। हेमचन्द्र रायचौधरी मालवों को निचली रावी घाटी में नदी के दोनों किनारों पर अवस्थित मानते हैं। एरियन के अनुसार मालव क्षुद्रकों के साथ सिकंदर के विरुद्ध संघ निर्मित करने को सहमत हो गए थे परन्तु शत्रु का आक्रमण अकस्मात हो जाने के कारण दोनों गणों को शत्रु के विरुद्ध कार्यवाही करने का अवसर नहीं मिला । इस विस्मयकारी आक्रमण से मालव पराजित हुए। मालवों ने अपने किलानुमा नगरी से अनवरत संघर्ष किया, परन्तु सदैव पराजित हुए। मालवों ने समर्पण करने की अपेक्षा नगरों को त्याग कर वनों और रेतीले क्षेत्र में निवास करना उचित समझा। मैक्रिन्डल का मत है कि मालवों के आक्रमण में स्वयं सिकंदर भी घायल हो गया था। तब उसने उनकी स्त्रियों और बालक-बालिकाओं का संहार करने का आदेश तक दे दिया था। लेकिन मालव निराश नही हुए। एरियन की मान्यता है कि सिकंदर ने मालवों को बुलाकर उनसे संधिवार्ता की थी जिसमें वे सफल हुए। मालवों तथा क्षुद्रकों की संयुक्त सेना में 90,000 या 80,000 पदाति, 10,000 घुड़सवार, 900 या 700 रथ थे। कर्टियस के अनुसार मालवों ने सिकंदर को कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ तथा घोडे और रथ भेंट किए थे। संस्कृत साहित्य में मालवों के शारीरिक गठन का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वे असाधारण कद काठी के थे। इनकी लंबाई 104 अंगुल अथवा 6 फीट 4 इंच के लगभग होती थी।


कौटिल्य ने गणों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाएं रखने की सलाह अर्थशास्त्र में दी है। इससे प्रतीत होता है कि मौर्यकाल मे भी गणजातियों ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी थी। यद्यपि कौटिल्य की सूची में मुद्रक, कुकुर, कुरु, पांचाल आदि पंजाब या मध्यप्रदेश की गणजातियों का उल्लेख मिलता है, मालवों का नहीं। इसलिए इस बात की संभावना है कि मौर्यकाल या शुंगकाल में मालवों ने अपना मूल निवास स्थान छोड दिया और राजपूताना की ओर पलायन कर गए। इस बात की पूरी संभावना है कि पलायन काल में मालव और क्षुद्रकों में समागम हो गया इसलिए बाद में क्षुद्रकों का उल्लेख नहीं मिलता है। जायसवाल का मत है कि मालवों ने भटिंडा के मार्ग से राजपूताना में प्रवेश किया। इसकी पुष्टि करते हुए उन्होंने लिखा है कि वर्तमान में भी मालवी बोली फिरोजपुर से भटिंडा तक बोली जाती है । प्रारंभ में मालवों के पंजाब तथा राजपूताना में निवास करने की जानकारी महाभारत में भी उपलब्ध है । एरियन ने लिखा है कि अर्कीसनेज (चेनाब) मल्लोई अर्थात मालवों के अधीन क्षेत्र में सिन्धु में जाकर मिलती है। इस प्रकार मल्ल (मालव) जाति चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक के राज्यकाल तक तो पंजाब में रही। मौर्य साम्राज्य के निर्बल होने तथा उस पर इंडो-ग्रीक आक्रमण होने पर वह पंजाब छोड़कर राजस्थान में आ गई। उपलब्ध प्रमाण के अनुसार मालव सर्वप्रथम पूर्वी-राजस्थान मे आकर बसे थे। विभिन्न साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि यह स्थान टौंक जिले का नगर या कर्कोट नगर नामक स्थान था जो आधुनिक राजस्थान के निर्माण से पूर्व उनियारा ठिकाने के अंतर्गत आता था।
 इस स्थल की खोज 1871-72 ई. में सर्वप्रथम कार्लाइल ने की थी। उन्हें यहाँ से 6000 ताम्र मुद्राएँ प्राप्त हुई थी। उनमें से 110 मुद्राएँ इन्डियन म्यूजियम कलकत्ता में संगृहीत की गई थीं। उन मुद्राओं का अध्ययन बिन्सेंट स्मिथ ने किया था। डॉ. स्मिथ का विचार था कि इन सिक्कों में से 35 सिक्के ऐसे थे जो बाहर से लाएं गए और शेष 75 सिक्के नगर में ही ढाले गए थे।

 

कार्लाइल ने इन सिक्कों का अध्ययन करके 40 मुख्य नामों की पहचान की थी उनमें से 20 तो मालवगण प्रमुखों के नाम हैं। इन मुद्राओं पर ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया था और उनका निर्माण काल मुद्राशास्त्रियों ने द्वितीय शताब्दी ई.पू. से चतुर्थ ई. के मध्य माना है। इन मुद्राओं की लिखावट में कम अक्षरों का प्रयोग किया गया है। इनका भार तथा आकार भी न्यूनतम है। गण प्रमुखों का नाम लिखने में भी लिपिक्रम एक समान नहीं रखा गया है। कुछ सिक्कों पर ब्राह्मी वर्ण इस प्रकार लिखे गए है कि उनको बाँये से दाएँ पढ़ना पड़ता है।


मालव आर्थिक दृष्टि से समृद्धृ थे। कर्कट नगर से मुद्राओं के अलावा मंदिर, बाँध, तालाब तथा माला की मणियाँ उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। जयपुर नगर से 56 मील की दूरी पर स्थित रेढ़ से भी मालवों के संबंध में जानकारी मिलती है। रेढ़ तीसरी शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई. तक आबाद रहा था। उस समय यहाँ मालव निवास कर रहे थे। यहाँ से मालवों की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। रैढ़ से 2 खाई से एक लेड सील प्राप्त हुई थी जो मालवगण से संबंधित है। उस पर ब्राह्मी में लिखा हुआ है। लेड सील पर (मा.) ल-व-ज-न-प-द उत्कीर्ण है, जिसे द्वितीय शताब्दी ई.पू. का माना जाता है। यह सील राज्य के अधिकारी काम में लेते थे। रेढ़ से मालवगण के 300 सिक्के प्राप्त हो चुके हैं।


मालव सिक्कों की विशेषताएँ निम्न हैं -

  • मालव सिक्के गोलाकार थे।

  • इन पर मालव नाम अथवा मालवानाम् जय लिखा हुआ था।

  • कुछ मुद्राओं पर लेख मुद्राओं के पार्श्व भाग पर लिखा है।



  • सिक्कों पर उज्जैन चिहन, सांप, लहरदार नदी, नंदीपाद, त्रिकोण, परशुमाला, वृक्ष, कूबड वाला बैल भी उत्कीर्ण है।

  • स्मिथ ने मालव सिक्कों का न्यूनतम भार 7 ग्रेन तथा व्यास 2 इंच बताया है जबकि रेढ़ के सिक्कों का न्यूनतम भार 2.41 ग्रेन तथा अधिकतम भार 43.84 ग्रेन है। उनका आकार 0.3 इंच से 0.6 इंच के मध्य है।


मलावों का क्षहरात शकों से संघर्ष का उल्लेख नासिक गुहालेख में मिलता है, जो द्वितीय शती ई. के प्रारंभ का माना जाता है । इस अभिलेख में ऋषमदत्त द्वारा उत्तम भद्रों की सहायता हेतु आना तथा मालवों को पराजित करने का विवरण मिलता है। दशरथ शर्मा का मत है कि उत्तम भद्र पंजाब के क्षत्रियों की एक शाखा थी जिसने अजमेर पुष्कर के उर्वरक क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। इस तरह मालवों की शक्ति कुछ समय के लिए क्षीण हो गई। उधर रूद्रदामा के जूनागढ़ अभिलेख से भी ज्ञात होता है कि 150 ई. के बाद पश्चिमी राजस्थान के अधिकांश भाग पर शकों का अधिकार हो गया था। ऐसी स्थिति में मालवों का स्वाधीनतापूर्वक रहना कठिन था। नांदसा यूप लेख से संकेत मिलता है कि बाद में शकों के गहृ युद्ध में लिप्त हो जाने का लाभ उठाकर मालव पुनः स्वतंत्र हो गए थे। नांदसा यूप लेख 226 ई. का है उससे ज्ञात होता है कि मालव नेता श्रीसोम अथवा नंदीसोम ने एक षष्ठीरात्री यज्ञ करके अपने गण की स्वतंत्रता की घोषणा की थी। नांदसा के एक अन्य लेख में उनके सेनापति भीट्टसोम का नाम मिलता है। इससे स्पष्ट है कि दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान पर मालवों का शासन था। अब मालवगण धीरे-धीरे कुलीन तंत्र में परिवर्तित हो गया था। नांदसा यूप लेख मालवों की आनुवांशिक शासन प्रणाली का संकेत देकर तथा उन्हें इक्षवाकु वंश से जोड़कर गौरव अनभुव करने की सूचना देता है। काशीप्रसाद जायसवाल का मत है कि द्वितीय शताब्दी ईस्वी में नाग वंश शक्तिशाली होकर मालवा, गुजरात और राजस्थान तथा पूर्वी पंजाब के अधिपति हो गए थे, तब मालव उनके प्रतिनिधि के रूप में जयपुर, अजमेर, मेवाड़ क्षेत्र में राज्य कर रहे थे। लेकिन तीसरी शताब्दी के पूर्वार्द्ध के पश्चात् मालवों में फूट पड़ गई। डॉ. डी.सी. शुक्ल का मत है कि तीसरी शताब्दी ईस्वी के पश्चात् मालव तीन शाखाओं में विभाजित हो गए जो विजयगढ़, बड़वा, दशपुर और मंदसौर में निवास करती थीं। औलिकर (दशपुर-मंदसौर) तो स्वयं को मालावों से संबंधित मानते थे। उनके अभिलेखों में कृत मालव संवत् का प्रयोग मिलता है। ऐसा माना जाता है कि बड़वा और विजयगढ़ के शासक मालवों की ही शाखा थे। वैसे राजस्थान के अधिकांश यूप लेख मालवगण के भू-भाग के आसपास पाए गए हैं।


मालवों के संबंध में समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति से भी जानकारी मिलती है। प्रयाग-प्रशस्ति के अनुसार मालव, यौधेयों, अर्जुनायन, मद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानिक काक, खरपरिक आदि गणराज्यों ने समुद्रगुप्त को कर देकर उसकी सभा में उपस्थित होने का वचन दिया, लेकिन 371 ई. के विजयगढ़ अभिलेख का अध्ययन करने पर प्रतीत होता है कि यौधेय गण अभी तक स्वतंत्रता का उपभोग कर रहे थे। मालवों का उल्लेख पुराणों (भागवत) में भी मिलता है। भागवत पुराण में मालवों का स्वतंत्र शासक के रूप में और विष्णु पुराण में आबू के शासक के रूप में उल्लेख मिलता है। समुद्रगुप्त के बाद मालव मंदसौर की ओर पलायन कर गए। स्कन्दगुप्त के समय वे प्रयाग तक चले गए। उदयपुर जिले के वल्लभनगर तहसील के बालाथल ग्राम जहाँ डॉ ललित पांडेय ने उत्खनन करवाया था, वहाँ से प्राप्त मृदभांडो पर ब्राह्मी का ‘म’ उत्कीर्ण है। इसीलिए इसे मालव प्रभावित क्षेत्र माना जा सकता है। इनकी दो मुद्राएँ मेवाड़ के नगरी मध्यमिका से प्राप्त हुई है, जिससे स्पष्ट है कि मालव राजस्थान के पूर्वी एवं दक्षिणी भाग के शासक थे।


ई.वी. सन् की प्रारंभिक शताब्दियों में मालवों का शकों के साथ संघर्ष होने का विवरण नासिक गुहालेख में मिलता है। यह संघर्ष क्षहरात वंश के साथ हुआ था। जूनागढ़ अभिलेख में रूद्रदामा प्रथम (130-150 ई.) का मालदा, गुजरात, काठियावाड़, सिन्धु, सौबीर पश्चिमी विन्ध्य तथा अरावली क्षेत्र (निषाद) और मरूक्षेत्र पर विजय करने का उल्लेख आता है। इसलिए यह निश्चित है कि उसका राजस्थान के मालवों के साथ फिर से संघर्ष हुआ होगा। ऐसी संभावना है कि मालव रूद्रदामा प्रथम के पश्चात् कार्दमक शकों में जो पारिवारिक संघर्ष हुआ, उसका लाभ उठाकर पुनः स्वतंत्र हो गए जिसकी पुष्टि नान्दसा यूप लेख, जो 226 ई. का है, उससे होती है।
स्रोत- राजस्थान का इतिहास (प्रारंभ से 1206 . तक) वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा

नांदसा यूप : प्राचीन स्तंभों की परंपरा का प्रमाण 

- डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू की कलम से ....



मेवाड़ से प्राचीन यूप मिले हैं। ये यूप स्तकम्भ की तरह ऊंचाई वाले और लिंग के आकार के बने हैं। इनमें भीलवाड़ा जिले के नांदसा गांव का यूप भारतीय विक्रम संवत के इतिहास ही नहीं, यज्ञ, दान, पुराण, स्मृति आदि कई परंपराओं के अध्यीयन और साक्ष्ये की दृष्टि से महत्वै रखता है। राजस्थान के यूपाभिलेखों में इस यूप का प्राचीनतम होने से खासा महत्व रहा है। इस पर भी खास बात ये कि नांदसा में दो यूप है और दोनों ही लेखांकित है। वहां मौजूद यूप पर जो लेख है, वह ब्राह्मी लिपि में हैं। दाएं से बाएं और ऊपर से नीचे समानत: लिखा गया है ताकि एक पाठ नष्ट, भी हो जाए तो दूसरा बच जाए। है न दूरदर्शिता। इसमें 61 दिन तक चलने वाले यज्ञसत्र का उल्लेख है, बृहद वैदिक यज्ञ का महत्वूपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य है।


हालांकि नांदसा गांव के निवासी इसका यही महत्व समझते हैं कि कभी-कभार कोई लोग इसको देखने आते हैं और इस पर कुछ लिखा हुआ है। वे यह मान्यता भी लिए हुए है कि पांडव कभी इधर आए थे और भरख गांव के मगरे से भीम ने जो तीर चढाकर फेंका था, वह यही है…। मुझे 1990 में नांदसावासियों से यह जनश्रुति सुनकर अजीब भी लगा, फिर याद आया कि ऐसी ही कहानियां अशोक के स्तंभों के साथ भी जुड़ी रही है। दरअसल, उनको जब मेरे एक अखबार के लेख से सूचना मिली कि यह मालवों की दिग्विजय का सूचक यूप है और इसमें संभवत: उसी सोम राजा का जिक्र है जिसका जिक्र विष्णुपुराण में हुआ है तो कुछ ग्रामीणों ने पत्र आदि के माध्यम से मेरा इस बात के लिए आभार माना कि यह तो गजब हो गया।


इस यूप पर कृतसंवत 282 का अभिलेख है, विक्रम संवत के नामकरण से पूर्व यही संवत मान्य था। ईस्वी सन् 226 में चैत्र मास की पूर्णिमा को यह रोपा गया था। तब गणित में इकाई, दहाई सैकडा कैसे होते थी, देखिए इसकी पहली पंक्ति –


सिद्धम्।


कृतयोर्द्वयोव्वनर्ष शतयोद्वयशीतयो : 200 80 2


चेत्रपूर्ण्णदमासीं मस्या म्पू र्वायां…।




इसमें दो सौ बयासी संख्या लिखने के लिए आज की तरह 282 नहीं लिखा बल्कि वर्णों के साथ ही 200, 80 और 2 लिखा गया है। इनका जोड़ 282 होता है, क्यों तब तक इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि को एकीकृत करके नहीं लिखा जाता था? यह विचारणीय है मगर यह बड़ा सच है कि जिस विक्रम संवत पर देश को अभिमान है, उसका प्राचीनतम प्रमाण मेवाड़ का नांदसा अपनी कोख में लिए हुए है। यही नहीं, इस यूप की बदौलत ही इस गांव में देश के कई ख्यातिलब्ध इतिहासकारों के पांव इस गांव में पड़े, शायद आज उनकी स्मृतियों के चिह्न भी मौजूद नहीं है, ये हैं – मि. कार्लायल, आर. आर. हल्दमर, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, प्रो. भाण्डारकर, डी. सी. सरकार आदि।


सौजन्य- राजस्थान के प्राचीन अभिलेख – संपादक-अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’, प्रकाशक राजस्थानी ग्रंथागार, सोजती गेट, जोधपुर, 2013 ई. पृष्ठ 22-24




राजस्थान की मालव गणजाति का ऐतिहासिक विवरण - राजस्थान की मालव गणजाति का ऐतिहासिक विवरण - Reviewed by asdfasdf on November 06, 2016 Rating: 5
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