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राजस्थान की सूक्ष्म एवं गर्म जलवायु में खजूर की खेती

July 18, 2018

केन्द्र सरकार एवं राजस्थान सरकार के प्रयासों और वैज्ञानिकों एवं कृषि विशेषज्ञों की मदद से राजस्थान के किसान पारंपरिक खेती के तरीकों के साथ-साथ आधुनिक कृषि के युग में प्रवेश कर रहे है। फलस्वरूप राजस्थान में जैतून, जोजोबा (होहोबा), खजूर जैसी वाणिज्यिक फसलें भी होने लगी है।

राज्य की सूक्ष्म एवं गर्म जलवायु खजूर की खेती के लिए वरदान साबित हो रही है। राजस्थान का उद्यानिकी विभाग उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के शुष्क रेगिस्तानी क्षेत्रों में खजूर की खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे रहा है। खजूर एक ऐसा पेड़ है जो विभिन्न प्रकार की जलवायु में अच्छी तरह से पनपता है। हालांकि, खजूर के फल को पूरी तरह से पकने और परिपक्व होने के दौरान लम्बे समय तक शुष्क गर्मी की आवश्यकता होती है। लम्बे समय तक बादल छाए रहने और हल्की बूंदाबादी इसकी फसल को अधिक नुकसान पहुंचाती है। 

इसके फूल आने और फल के पकने के मध्य की समयावधि का औसत तापमान कम से कम एक महीने के लिए 21 डिग्री सेल्सियस से 27 डिग्री सेल्सियस अथवा इससे अधिक होना चाहिए। फल की सफलतापूर्वक परिपक्वता के लिए लगभग 3000 हीट यूनिटस की आवश्यक होती हैं। राजस्थान का मौसम इसके लिए उपयुक्त हैं।




राजस्थान सरकार ने वर्ष 2007-2008 में राज्य में खजूर की खेती की परियोजना शुरू करने की पहल की थी। जैसलमेर के सरकारी खेतों और बीकानेर में मैकेनाइज्ड कृषि फार्म के कुल 135 हेक्टेयर क्षेत्रों पर खजूर की खेती शुरू की गई। इसमें से 97 हेक्टेयर क्षेत्र जैसलमेर में और 38 हेक्टेयर क्षेत्र बीकानेर में था। राज्य में वर्ष 2008-2009 में किसानों द्वारा खजूर की खेती शुरू की गई। खजूर की खेती के लिए राज्य के 12 जिलों जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, नागौर, पाली, जालौर, झुंझुनूं, सिरोही और चुरू का चयन किया गया। 2007-2008 में सरकारी खेतों के लिए संयुक्त अरब अमीरात से 21,294 टिशू कल्चर से उगाये गये पौधे आयात किए गए। 2008 से 2011 की अवधि में किसानों की भूमि पर खेती हेतु ऐसे ही लगभग 1,32,000 पौधे तीन चरणों में संयुक्त अरब अमीरात और ब्रिटेन से आयात किए गए थे।

वर्तमान में राज्य के किसानों द्वारा अब तक कुल 813 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र पर खजूर की खेती की जा रही है। राज्य द्वारा वर्ष 2016-17 तक खजूर की खेती के लिए 150 हेक्टेयर से और अधिक भूमि को इसमें शामिल करने का लक्ष्य प्रस्तावित है। भारत-इजरायल के सहयोग से सागरा-भोजका फार्म पर खजूर पर अनुसंधान कार्य चल रहा है। डेट या डेट पाम (खजूर) के रूप में जाना जाने वाला फीनिक्स डाक्ट्यलीफेरा सामान्यतः पाम फेमिली के फूल वाले पौधे की प्रजातियां हैं। खाने योग्य मीठे फलों के कारण अरेकेसिये की खेती की जाती है।

खजूर की बेहतरीन किस्म उगाने के लिए राज्य सरकार द्वारा 3 मार्च 2009 को जोधपुर में अतुल लिमिटेड के साथ मिलकर एक टिशू कल्चर प्रयोगशाला की शुरूआत की गई। अप्रैल, 2012 से इस प्रयोगशाला ने टिशू कल्चर खजूर की खेती करना शुरू किया गया। राज्य सरकार द्वारा इस प्रकार के करीब 25,000 पौधों के उगने की उम्मीद की जा रही है। वर्तमान में राजस्थान में खजूर की सात किस्मों यथा बारही, खुनेजी, खालास, मेडजूल, खाद्रावी, जामली एवं सगई की खेती की जा रही है। राज्य सरकार द्वारा टिशू कल्चर तकनीक पर खजूर की खेती करने वाले किसानों को वर्ष 2014-2015 में 90 प्रतिशत अनुदान दिया गया। इसी प्रकार 2015-2016 से किसानों को टिशू कल्चर के आधार पर 75 प्रतिशत अनुदान अथवा अधिकतम प्रति हेक्टेयर 3,12,450 रूपए की राशि दी जा रही है।
 


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Bovine animals in Rajasthan राजस्थान में गौ-वंश - (राजस्थान में पशुधन)

July 15, 2018

राजस्थान में गौ-वंश

राजस्थान के पशुपालन के क्षेत्र में गाय का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजस्थान की अर्थव्यवस्था में गौधन का महत्वपूर्ण स्थान है।  भारत की समस्त गौ वंश का लगभग 8 प्रतिशत भाग राजस्थान में पाया जाता है।
गौ वंश संख्या में भारत में प्रथम स्थान उत्तरप्रदेश का है। राजस्थान राज्य का भारत में गौ-वंश संख्या में सातवाँ स्थान है। राज्य में कुल पशु-सम्पदा में गौ-वंश प्रतिशत 22.8 % है। संख्या में बकरी के पश्चात् गौवंश का स्थान दूसरा है। राजस्थान में अधिकतम गौवंश उदयपुर जिले में हैं जबकि न्यूनतम धौलपुर में हैं। गौशाला विकास कार्यक्रम की राज्य में शीर्ष संस्था राजस्थान गौशाला पिजंरापोल संघ, जयपुर है। बस्सी (जयपुर) में गौवंश संवर्धन फार्म स्थापित किया गया है। राज्य गौ सेवा आयोग, जयपुर की स्थापना 23 मार्च 1951 को की गई थी। गौ-संवर्धन के लिए दौसा व कोड़मदेसर (बीकानेर) में गौ सदन स्थापित किए गए हैं।
  • राज्य में पशुगणना 2012 के अनुसार कुल गौधन संख्या 1,33,24,462 या लगभग 133.2 लाख (13.32 मिलियन) है। 
  • अन्तर पशुगणना अवधि (2007-2012) के दौरान गौधन की संख्या में 9.94% की वृद्धि हुई है।  
  • पशुगणना 2012 में कुल विदेशी / संकर गौधन संख्या 2003 की पशुगणना की संख्या 4.6 लाख (0.46 million) से बढ़कर 17.3 लाख (1.73 million) हो गई है। 
  • पशुगणना 2012 में कुल देशी गौधन संख्या 2003 की पशुगणना की संख्या 103.9 लाख (10.39 million) से बढ़कर 115.8 लाख (11.58 million) हो गई है। 
  • विदेशी / संकर और देशी गौधन की संख्या में प्रतिशत परिवर्तन ''अन्तर जनगणना अवधि'' (2007-2012) के दौरान क्रमश: 112.72% और 2.53% है। 
मादा गौधन-
  • पशुगणना 2012 के अनुसार राज्य में मादा गौधन की कुल संख्या 100.6 लाख (10.06 million) है।
  • पशुगणना 2003 की मादा गौधन की संख्या 72.3 लाख की तुलना में यह बढ़ कर पशुगणना 2012 में 100.6 लाख हो गई है। पिछली पशुगणना की तुलना में यह वृद्धि 18.62% की हुई है।

राजस्थान में जिलावार गौधन की संख्या- 

2012 की पशुगणना में गौधन की संख्या में प्रथम तीन स्थान के जिले निम्नांकित हैं-  
प्रथम           -         उदयपुर      कुल गौवंश में 7.30% का योगदान (कुल संख्या 9,72,182) 
द्वितीय      -         बीकानेर      कुल गौवंश में 6.80% का योगदान (कुल संख्या 9,06,075) 
तृतीय          -        जोधपुर       कुल गौवंश में 6.37% का योगदान  (कुल संख्या 8,48,343)

इसकी निम्नलिखित नस्ले राजस्थान में पाई जाती है।

1.    नागौरी (Nagauri)-

  • इसका उत्पत्ति क्षेत्र  ‘सुहालक' प्रदेश नागौर है। इस किस्म के बैल अधिकतर जोधपुर, बीकानेर, नागौर तथा नागौर से लगने वाले पड़ौसी जिलों में पाए जाते हैं। 
  • इस नस्ल की गायें कम दूध देती है। 
  • ये राजस्थान की कठोर जलवायु परिस्थितियों के लिए अनुकूलित होते हैं। 
  • इनका रंग आम तौर पर सफेद या हल्का भूरा होता है। कुछ मामलों में सिर, चेहरा और कंधे थोड़ा भूरे रंग के होते हैं। 
  • यह बैल एक घोड़े की तरह लंबा और संकीर्ण चेहरे के साथ सफेद, उदार, बहुत सतर्क और चुस्त जानवर होता है। ये बैल बड़े और शक्तिशाली होते हैं। 
  • ये बैल गहरी रेत में भारी बोझ को खींचने का काम करने में सक्षम होते हैं। इनके पैरों की हड्डियों में हल्की होने की प्रवृत्ति होती है, लेकिन पैर मजबूत होते हैं। इस विशेषता ने इस नस्ल को चपलता और गति में विशिष्टता प्रदान की है। इस तरह यह चाल में एक घोड़े की तरह बदल जाता है।
  • इस नस्ल में औसत ऊंचाई नर की 148 सेमी तथा मादा की 124 सेमी होती है।
  • नर की औसत लम्बाई 145 सेमी तथा मादा की 138 सेमी होती है।
  • नर का औसत वजन 363 किग्रा तथा मादा का 318 किग्रा होता है।
  • पहले प्रसव के समय इसकी आयु औसतन 47.37 महीने होती है। औसतन प्रति 15.16 माह पश्चात गर्भ धारण करती है।
  • इसमें प्रति स्तन्यस्त्रवण सत्र में दूध उपज औसतन 603 किलो होती है।
  • इसके दूध में वसा औसत 5.8 % होती है।




2.    कांकरेज (Kankrej)-

  • यह गुजरात में बनासकांठा जिले के भौगोलिक क्षेत्र कंक तालुका के नाम से इसका नाम कांकरेज पड़ा है।
  • राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भागों बाड़मेर, जोधपुर, सिरोही तथा जालौर जिलों में पाई जाती है।
  • इस नस्ल की गायें प्रतिदिन 5 से 10 लीटर दूध देती है। 
  • इस नस्ल के बैल भी अच्छे भार वाहक होते हैं। अतः ग्रामीण क्षेत्र में कृषि कार्यों का संचालन और सड़क परिवहन मुख्य रूप से इस नस्ल के बैलों द्वारा किया जाता है। दूध देने तथा कृषि व भारवहन कार्य में उपयोगी होने के कारण इस नस्ल के गौ-वंश को ‘द्वि-परियोजनीय नस्ल' कहते है। 
  • इसका रंग रजत-भूरा, लोह-भूरा या स्टील-भूरा होता हैं। 
  • यह गायों की सबसे भारी नस्लों में से एक है। 
  • इसमें मजबूत वीणा आकार के सींग मुड़े हुए मस्तक के बाहरी कोनों से निकलकर बाहर की ओर, फिर ऊपर व बाद में अंदर की ओर मुड़ते हैं तथा ये सींग काफी ऊंचाई तक चमड़ी के ढके रहते हैं। बड़े पेंडुलस व खुले कान होते हैं।

कांकरेज की अनोखी 'सवाई चाल' -

कांकरेज नस्ल की चाल अनोखी होती है। इसकी चाल सुकुमार (smooth) होती है, गति करते समय शरीर में शायद ही कोई हलचल होती है, चलते समय सिर काफी हद तक ऊँचा रखा जाता है, लम्बा डग भरा जाता है तथा गति करते समय आगे के खुर के पदचिन्ह पर पीछे का खुर रखा जाता है। इस चाल में पशु का पिछला पैर जमीन पर टिकने से पहले ही अगला पैर उठ जाता है। इस चाल को पशुपालकों द्वारा 'सवाई चाल' (1¼ Pace) कहा जाता है।
  • पहले प्रसव के समय इसकी आयु औसतन 47.3 महीने होती है। औसतन प्रति 15.06 माह पश्चात गर्भ धारण करती है।
  • इसमें प्रति स्तन्यस्त्रवण सत्र में दूध उपज औसतन 1738 किलो होती है।
  • इसके दूध में वसा 2.9 से 4.2 % तक होती है।
  • इस नस्ल में औसत ऊंचाई नर की 158 सेमी तथा मादा की 125 सेमी होती है।
  • नर की औसत लम्बाई 148 सेमी तथा मादा की 123 सेमी होती है।
  • नर का औसत वजन 525 किग्रा तथा मादा का 343 किग्रा होता है।

3.    थारपारकर (Tharparkar or Malani) -

  • थारपारकर का नाम की उत्पत्ति थार रेगिस्तान से हुई है। 
  • इसका उत्पत्ति स्थल मालाणी (बाड़मेर) है। 
  • यह गायें अत्यधिक दूध के लिए प्रसिद्ध है, इसे स्थानीय भागों में ‘मालाणी नस्ल' के नाम से जाना जाता है। 
  • यह बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर में पाई जाती है। 
  • पशु सफेद या हल्के भूरे रंग के होते हैं। चेहरे व पीछे का भाग शरीर की तुलना में एक गहरे रंग का होता है। बैल की गर्दन में, कूबड़ पर और सामने व पीछे का चौथाई भाग गहरे रंग का होता है। 
  • इसके मध्यम दर्जे के सींग खम्भे के एकसमान सीधी रेखा में निकलकर धीरे-धीरे ऊपर जाकर अंदर की ओर मुड़ते हैं। नर में, सींग मोटे, छोटे होते हैं। 
  • पहले प्रसव के समय इसकी आयु औसतन 41.03 महीने होती है। औसतन प्रति 14.18 माह पश्चात गर्भ धारण करती है।
  • इसमें प्रति स्तन्यस्त्रवण सत्र में दूध उपज औसतन 1749 किलो होती है।
  • इसके दूध में वसा 4.72 से 4.9 % तक होती है।
  • इस नस्ल में औसत ऊंचाई नर की 133 सेमी तथा मादा की 130 सेमी होती है।
  • नर की औसत लम्बाई 142 सेमी तथा मादा की 132 सेमी होती है।
  • नर का औसत वजन 475 किग्रा तथा मादा का 295 किग्रा होता है।

4.    राठी (Rathi)-

  • यह राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भागों में श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर में पाई जाती है। 
  • इस नस्ल की गायें अत्यधिक दूध के लिए प्रसिद्ध है, किन्तु इस नस्ल के बैलों में भार वहन क्षमता कम होती है। अत्यधिक दूध के कारण इसे राजस्थान की कामधेनू भी कहते है।
  • राठी विशेष रूप से बीकानेर जिले के लुनकरनसर तहसील में केंद्रित हैं जिसे राठी क्षेत्र भी कहा जाता है। 
  • इसके नाम की उत्पत्ति को खानाबदोश जीवन जीने वाली राठ मुसलमान जाति से भी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा लगता है कि राठी नस्ल साहिवाल रक्त की पूर्वनिर्धारितता के साथ साहिवाल, लाल सिंधी, थारपाकर और धन्नी नस्लों के मिश्रण से उत्पन्न हुई हैं।
  • नोहर (हनुमानगढ़) में राठी के लिए गोवंश परियोजना केन्द्र व फर्टिलिटी की स्थापना।
  •  आमतौर पर इन जानवरों का रंग शरीर पर सफेद धब्बों के साथ भूरा होता हैं, लेकिन सफेद धब्बे के साथ पूरी तरह से भूरे रंग के, या काले रंग के पशु भी अक्सर मिल जाते है। शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में निचले शरीर के अंग आम तौर पर रंग में हल्के होते हैं। इनके सींग आकार में मध्यम से कम होते हैं।
  • यह गाय औसतन 114.92 सेमी ऊँची तथा 131.33 सेमी लम्बी होती है। इसका औसत वजन 295 किग्रा होता है।
  • पहले प्रसव के समय इसकी आयु औसतन 46.4 महीने होती है। औसतन प्रति 17.07 माह पश्चात गर्भ धारण करती है।
  • इसमें प्रति स्तन्यस्त्रवण सत्र में दूध उपज औसतन 1560 किलो होती है।
  • इसके दूध में वसा 3.7 से 4 % तक होती है।

5.    गिर (Gir) –

  • इसकी उत्पत्ति गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र विशेष रूप से गिर वन के आसपास के क्षेत्र से हुई है।
  • यह पशु दक्षिणी-पूर्वी भाग (अजमेर, चित्तौड़गढ़, बूंदी, कोटा आदि जिलों) में सर्वाधिक पाए जाते हैं।
  • इन्हें भोदाली, देसन, गुजराती, काठियावाड़ी, सॉर्थी और सूरती आदि नामों से भी जाना जाता हैं। इस नस्ल की गाय को राजस्थान में रेंडा एवं अजमेर में अजमेरा भी कहते हैं। यह भी द्विपरियोजनीय नस्ल है।
  • गिर गाएं दूध की अच्छी उत्पादक होती हैं।
  • गिर बैल सभी प्रकार की मिट्टी में भारी भार खींच सकता है, चाहे वह रेतीली, काली या चट्टानी मृदा हो।
  • अधिकांश गिर गाएं शुद्ध लाल रंग की होती है, हालांकि कुछ लाल धब्बेदार भी होती हैं।
  • इनके सींग असाधारण घुमावदार होते हैं, जो अर्द्ध चंद्रमा जैसे होते हैं। अनूठे ढंग से मुड़े हुए गोल सींग होते हैं।
  • गिर एक विश्व प्रसिद्ध नस्ल है जो तनाव की स्थिति में अपनी सहिष्णुता (tolerance) के लिए जानी जाती है।
  • इसे ब्राजील, यूएसए, वेनेज़ुएला और मेक्सिको द्वारा आयात भी किया गया है, और वहां इसका प्रजनन भी करवाया गया है।
  • इसमें कम खुराक में अधिक दूध देने की क्षमता होती है और यह विभिन्न उष्णकटिबंधीय बीमारियों से प्रतिरोधी भी होती है।
  • इसके बछड़ों को 8 से 12 महीने तक थन चूसने दिए जाते है।
  • दूध देने वाली गायों को आमतौर पर गांव में ही रखा जाता है, जबकि सूखी गाय और युवा बछड़ों को चराई के लिए भेजा जाता है।
  • पहले प्रसव के समय इसकी आयु औसतन 46.08 महीने होती है।
  • इसमें प्रति स्तन्यस्त्रवण सत्र में दूध उपज औसतन 2110 किलो होती है।
  • इसके दूध में वसा 4.6 % होती है।
  • गिर नस्ल में औसत ऊंचाई नर की 159.84 सेमी तथा मादा की 130.79 सेमी होती है।
  • नर की औसत लम्बाई 137.51 सेमी तथा मादा की 131.4 सेमी होती है।
  • नर का औसत वजन 544 किग्रा तथा मादा का 310 किग्रा होता है।

6. मेवाती -

  • यह अलवर, भरतपुर में पाई जाती है। इसका दूसरा नाम कोसी, मेहावती व काठी भी है। 
  • ये मेवाती पशु शक्तिशाली किन्तु शांत व विनम्र किस्म के होते हैं तथा भारी जुताई, गाडी खींचने, गहरे कुओं से पानी निकालने के लिए उपयोगी होते हैं। यह भी द्विपरियोजनीय नस्ल है।
  • मेवाती के मवेशी सफेद होते हैं, जिनमें आमतौर पर गर्दन, कंधे आदि लगभग चौथाई भाग में गहरे रंग की छाया होती है। 
  • इनका चेहरा लंबा, संकड़ा और सीधा होता है लेकिन कभी-कभी माथा उभरा हुआ भी होता है। 
  • इन जानवरों के सींग बाहर की तरफ, ऊपर की ओर, अंदर की ओर घुमाव लिए होते हैं।
  • इस नस्ल में औसत ऊंचाई नर की 138.9 सेमी तथा मादा की 125.4 सेमी होती है।
  • नर की औसत लम्बाई 117.69 सेमी तथा मादा की 114.8 सेमी होती है।
  • नर का औसत वजन 385 किग्रा तथा मादा का 325 किग्रा होता है।
  • पहले प्रसव के समय इसकी आयु 45 से 54 महीने होती है। यह प्रति 12 से 18 माह पश्चात गर्भ धारण करती है।
  • इसमें प्रति स्तन्यस्त्रवण सत्र में दूध उपज औसतन 958 किलो होती है।

7. साहीवाल गाय - 

  • यह नस्ल गंगानगर में पाई जाती है।  
  • यह ज़ेबू मवेशियों की सबसे अच्छी डेयरी नस्लों में से एक है।  
  • यह नस्ल पाकिस्तान के पंजाब के मोंटगोमेरी जिले के साहिवाल क्षेत्र के कारण इसका यह नाम पड़ा है। 
  • इसका रंग भूरा लाल होता है और इसके रंगों के शेड महोगनी लाल भूरे से अधिक भूरे लाल तक बदलता है। 
  • इसके बैल के शरीर के अंत भागों का रंग शेष शरीर से गहरा होता है। इन गायों का सिर चौड़ा, सींग छोटी और मोटी, तथा माथा मझोला होता है।
  • इसके सींग ठूंठ जैसे (स्टम्पी) व छोटे से माध्यम आकार के होते हैं, जो पहले बाहर की ओर, फिर ऊपर की ओर जाते है व अंत में अन्दर की ओर मुड़ते है। 
  • इस नस्ल की दृश्य विशेषता लाल रंग, छोटे सींग एवं ढीली त्वचा हैं।
  • इस नस्ल में औसत ऊंचाई नर की 170 सेमी तथा मादा की 124 सेमी होती है।
  • नर की औसत लम्बाई 150 सेमी तथा मादा की 131 सेमी होती है।
  • नर का औसत वजन 540 किग्रा तथा मादा का 327 किग्रा होता है।
  • पहले प्रसव के समय इसकी औसत आयु 41.7 महीने होती है। यह औसतन प्रति 15.6 माह पश्चात गर्भ धारण करती है।
  • इसमें प्रति स्तन्यस्त्रवण सत्र में दूध उपज औसतन 2325 किलो होती है।

8. मालवी-

  • इसका मूलस्थान मध्यप्रदेश का मालवा क्षेत्र (रतलाम, मंदसौर, उज्जैन ) है।राजस्थान में ये मध्यप्रदेश के मालवा से सटे क्षेत्र में पाए जाते हैं।
  • इसे महादेवपुरी, मंथानी भी कहते हैं। 
  • इस नस्ल की टाँगे छोटी व मजबूत होती है तथा छोटा कद व गठीला बदन होने के कारण यह पहाड़ी क्षेत्रों में उबड़ खाबड़ भूमि पर आसानी से चल सकती है। इसलिए मालवी नस्ल के बैल भारवाहक के रूप में प्रसिद्ध है।  
  • लेकिन इस नस्ल की गाएं दूध कम देती है। 
  • इनका रंग सफ़ेद या सफ़ेद भूरा होता है और नर का रंग अपेक्षाकृत गहरा होता है। नर में गर्दन, कूल्हे , कंधे व क्वार्टर लगभग काले होते हैं। गाय और बैल उम्र बढ़ने पर लगभग शुद्ध श्वेत रंग के हो जाते हैं। सफ़ेद रंग का मजबूत अच्छा शरीर व वीणा के आकार के सींग इस जानवर की दृश्य विशेषता है।

9. हरियाणवी - 

  • इनका मूल स्थान हरियाणा है। यह रोहतक, हिसार, गुडगाँव, सोनीपत, जिंद, झज्जर (हरियाणा) के अलावा राजस्थान में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ चुरू, सीकर, टोंक, जयपुर में पाई जाती है। 
  • इसका उद्गम हिसार व हंसी नामक दो हरियाणवी नस्लों से हुआ है अतः इसे हंसी भी कहा जाता है। 
  • इस नस्ल के लिए कुम्हेर (भरतपुर) में वृषभ पालन केन्द्र स्थापित है।  
  • हरियाणवी उत्तर भारत की एक प्रमुख द्विपरियोजनीय नस्ल है जो व्यापक रूप से इंडो गंगा मैदानी इलाकों में फैली हुई है। 
  • इसका पालन मुख्य रूप से बैल उत्पादन के लिए किया जाता है किन्तु ये गाएं काफी अच्छा दूध भी देती है।
  • ये बैल शक्तिशाली होते हैं व सडक़ परिवहन तथा भारी हल चलाने के काम में उपयोगी होते है। 
  • हरयाणवी नस्ल के जानवर उच्च तापमान सहन कर सकते हैं। इस नस्ल के बैल ऊँचे कूबड़ के कारण अत्यंत आकर्षक होते हैं।
  • ये बैल पथरीले खेतों या भीषण गर्मी में कई घंटों तक लगातार काम कर सकते हैं और अत्यंत गर्मी में भी भारी वजन ढो कर प्रति घंटे 25 किलोमीटर चल सकते है।
  • इन जानवरों में लम्बा-संकरा चेहरा और छोटे सींग पाए जाते है।
  • ये जानवर रंग में सफेद या हल्के भूरे रंग के होते हैं। बैल सामने और पीछे के भाग में अपेक्षाकृत काले या गहरे भूरे रंग के होते हैं। 
  • ये गाएं सौम्य स्वभाव की होती हैं। ये प्रतिदिन 5-8 लीटर दूध देती हैं। कड़ी मेहनत का स्वभाव, उच्च दूध उत्पादन और किसी भी मौसम को सहने की क्षमता के कारण हरियाणा नस्ल विश्व के कई देशों में फैली है।
राजस्थान में विदेशी नस्ल की गायें-
(1) रेड डन - इसका मूल स्थान डेनमार्क है।  यह 20 से 25 लीटर दूध देती है।
(2) हॉलिस्टन – इसका मूलस्थान हॉलेंड व अमेरिका है। यह सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल है। इसके दूध में वसा की मात्रा 5 प्रतिशत होती है। यह राज्य के मध्य व पूर्वी राजस्थान में पाली जाती है।
(3) जर्सी – इसका मूलस्थान अमेरिका है । ये बहुत कम उम्र में दूध देने लगती है। इसके दूध में वसा की मात्रा 4 प्रतिशत होती है। यह राज्य के मध्य व पूर्वी राजस्थान में पाली जाती है।

गायों में होने वाले प्रमुख रोग - 

गाय में फाइलेरिऐसीस, थिलेरिएसिस, एनाप्लाज़्मोसिस, फैसिलियोसिस, बेबीसीयोसिस, व खुरपका, मुंहपका, रिंदरपेस्ट नामक रोग पाए जाते है।
      राजस्थान के प्रमुख गौवंश नस्ल केन्द्र-
      1. गिर - डग, झालावाड़
      2. जर्सी गाय - बस्सी, जयपुर
      3. मेवाती - अलवर
      4. थारपारकर - सूरतगढ़, गंगानगर
      5. हरियाणवी - कुम्हेर, भरतपुर
      6. राठी - नोहर, हनुमानगढ़
      7. नागौरी - नागौर
      8. थारपारकर - चांदन, जैसलमेर

      9. कांकरेज - चौहटन (बाड़मेर)


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      Agricultural practices in Rajasthan राजस्थान की कृषि पद्वतियां

      June 29, 2018

      Agricultural practices in Rajasthan - राजस्थान में कृषि पद्वतियां

      राजस्थान की कृषि मूलत: वर्षा आधारित है लेकिन सिंचाई के साधनों निरंतर वृद्धि के कारण यहाँ पर विभिन्न खाद्यान्न व व्यापारिक फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। राजस्थान की भौतिक जलवायुगत सामाजिक-आर्थिक दशाआें की विविधताओं के कारण कृषि पद्वति परम्पराओं साधनों आदि में स्थानिक भिन्नता पाई जाती है। राज्य में कृषि का आर्थिक दृष्टि से नहीं वरन् सामाजिक दृष्टि से भी महत्त्व है।
      वर्तमान में राज्य की कुल आय का लगभग 50 प्रतिशत एवं पशुपालन से ही प्राप्त होता है। क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है। कृषि क्षेत्र की दृष्टि से इसका देश में चौथा स्थान है। राजस्थान में देश के कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत भाग है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 48.30 प्रतिशत शुद्ध बोया गया क्षेत्र है। यहाँ की कृषि मुख्यतः वर्षा आधारित है। यहाँ की कृषि में स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है। यहाँ पर कृषि राष्ट्रीय आय का साधन, जीवन का आधार, रोजगार का प्रमुख साधन, खाद्यान्न प्राप्ति का स्रोत तथा द्वितीयक व तृतीयक व्यवसायों के विकास में सहायक है।
      राजस्थान की कृषिगत अर्थव्यवस्था मूलत: अस्थिर (Unstable) कही जा सकती है। राज्य का तिलहन, धनिया, जीरा, कपास, ईसबगोल, मेथी, जौ, मूंगफली, मिर्ची, बाजरा के उत्पादन में प्रथम स्थान है।

      राज्य की कृषि की प्रमुख विशेषताएँ - 

      • मानसून का जुआ, 
      • खाद्यान्न फसलों की अधिकता,
      • गत दशक में व्यापारिक फसलों की ओर रुझान में वृद्धि, 
      • कृषि क्षेत्र वितरण में असमानता, शुष्क कृषि की अधिकता, 
      • मानवीय श्रम का आधिक्य,
      • जोत का छोटा आकार,
      • खाद व उर्वरकों का अपेक्षाकृत कम उपयोग आदि।
      राज्य की भौगोलिक विषमताओं के कारण यहाँ पर कृषि में क्षेत्रीय आधार पर स्थानिक विविधता पाई जाती है। अलग अलग क्षेत्रों में कृषि अलग-अलग प्रकार से की जाती है।
      राज्य में कृषि के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित है-

      (1) 'वालरा' या 'झूमिंग' कृषि पद्वति (Jhuming or Walra Farming) :-

      राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भागों में भीलों गरासिया डामोर आदि द्वारा जंगलों को जलाकर उस राख युक्त (फास्फोरसमय) स्थान पर मक्का आदि की फसल वर्षा होने पर मेवाड़ एवं बागड़ प्रदेश में की जाती रही है। इनमें दो तीन वर्ष तक फसल प्राप्त करने के खेत को छोड़कर इसी प्रकार की कृषि को राजस्थान में 'वालरा', आसाम में ‘झूमिंग‘, मध्यप्रदेश में 'कुमारी‘ कहते हैं। यह आदिवासी, रूढिगत तथा अविकसित कृषि पद्वति है। इससे जंगल नष्ट होने के कारण पर्यावरण की समस्या भी बढी है। अब जंगल कम होने से 'वालरा' कृषि भी बहुत कम हो गई है। 

      (2) शुष्क  खेती  (Dry Farming) :-

      राजस्थान के अरावली के पश्चिमी एवं संक्रमण क्षेत्र (Transitional Zones) में जहाँ 50 से.मी. से कम औसत वार्षिक वर्षा होती है ‘शुष्क कृषि पद्वति‘‘ की जाती है। यह पद्वति जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनू, चुरू, बीकानेर, जोधपुर, पाली, नागौर,  टोंक, करौली आदि  में प्रचलित है। इस में वर्षा होने के साथ ही खेती की जुताई-बुवाई की प्रारम्भ कर देते हैं तथा आवश्यकतानुसार बुवाई-जुताई की जाती है तथा संरक्षित नमी को जुताई के द्वारा उपर उभारा जाता है तथा उस खेत में पटेला चलाकर उसे समतल कर दिया जाता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया दोहराने से नमी को संरक्षित (Conserve) कर लिया जाता है एवं फसल बोने के लिए उपयुक्त तापमान तथा मौसम आने पर बुवाई कर दी जाती है यही ‘‘शुष्क खेती‘‘ कहलाती है। 

       

      (3) सिंचित कृषि (Irrigated Farming) :-

      10 से 50 सेन्टीमीटर वर्षा वाले स्थानों में जहाँ फसल की सिंचाई नहरों, कुओं, बाँधों, तालाबों से पानी की पूर्ति आवश्यकता होती है ‘‘सिंचित खेती‘‘ की जाती है। श्रीगंगानगर, हनुमानगढ, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ, प्रतापगढ़, अजमेर,पाली, भीलवाड़ा, उदयपुर, डूंगरपुर, राजसमन्द आदि जिलों में सिंचित कृषि की जाती है।
      (4) आर्द्र कृषि (Humid Farming)  :-
      जिस मिट्टी में अधिक समय तक पानी रूक सकता है उन क्षेत्रों में यह कृषि पद्वति प्रचलित है। जहाँ 100 से.मी. की जाती है। कोटा, बारां, बाँसवाड़ा, झालावाड़, बनास एवं साबरमती नदी के कुछ भागों में इसी प्रकार की खेती की जाती है। यह काली एवं कांपीय मिट्टी का क्षेत्र है तथा इसमें चावल, कपास, गेहूँ उद्यान फसलें, गन्ना, मक्का, ज्वार, अरहर आदि की फसलें होती है।

       

      (5) मिश्रित  खेती  :-

      इस प्रकार की कृषि में कई फसलों को एक साथ मिलाकर बोया जाता है जैसे गेहूँ व चना आदि अर्थात् खेती का वह ढंग है जिसमें कृषक एक समय में एक खेत में एक से अधिक फसलों को बोकर खेती करते हैं। विभिन्न फसलाें के बीज तीन प्रकार से बोए जाते हैं -

      (1) बीजों कतारों में बोना 
      (2) बीजों को मिलाकर फिर छिड़ककर बोना 
      (3) सहचर क्रियाओं के माध्यम से। 

       

      मिश्रित खेती और मिश्रित कृषि में अंतर-

      मिश्रित खेती मिश्रित कृषि से भिन्न होती है। मिश्रित कृषि (Mixed  Farming) में फसलोंत्पादन के साथ-साथ दूधारू पशुओं जैसे गाय-भैंस को पाला जाता है जिसमें फसलोत्पादन व पशुपालन एक दूसरे के पूरक व्यवसाय कहे जाते हैं।

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      Agricultural practices in Rajasthan राजस्थान की कृषि पद्वतियां Agricultural practices in Rajasthan राजस्थान की कृषि पद्वतियां Reviewed by asdfasdf on June 29, 2018 Rating: 5

      राजस्थान के धरातलीय प्रदेश- अरावली पर्वत श्रेणी और पहाड़ी प्रदेश-

      August 27, 2016
      राजस्थान के धरातलीय प्रदेश- अरावली पर्वत श्रेणी और पहाड़ी प्रदेश-
      अरावली पर्वत श्रृंखला प्रदेश राजस्थान की मुख्य एवं विशिष्ट पर्वत श्रेणी है। यह विश्व की प्राचीनतम् पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह दक्षिण-पश्चिम में सिरोही से प्रारंभ होकर उत्तर-पूर्व में खेतड़ी तक तथा आगे उत्तर में छोटी-छोटी श्रृंखलाओं के रूप में दिल्ली तक विस्तृत है। भूगर्भिक इतिहास की दृष्टि से अरावली पर्वत श्रेणी धारवाड़ समय के समाप्त होने के साथ से संबधित है। यह श्रृंखला समप्राय: थी और केम्ब्रियन युग में पुन: उठी और विध्ययन काल के अंत तक यह पर्वत श्रृंखला अपने अस्तित्व में आयी। यह पर्वत श्रृंखला सर्वप्रथम मेसाजोइक युग में समप्राय: हुई और टरशरी काल के रंभ में इसका पुरुत्थान हुआ। इसका दक्षिण की ओर विस्तार इस समय समुद्र के नीचे है जो टरशरी काल में दक्कन ट्रेप के एकत्रीकरण के पश्चात विस्तृत हुआ। इस प्रदेश में फाइलाईट्स, नीस, शिष्ट और ग्रेनाइट चट्टानों की प्रधानता है। इस प्रदेश की औसत ऊँचाई 1225 मीटर है। इस पर्वत श्रेणी की प्रमुख चोटियों में गुरुशिखर (1727 मीटर) सर्वाधिक ऊँची है।
           अन्य प्रमुख चोटियाँ निम्नांकित है-
      1. सेर (1597 मीटर),
      2. जरगा (1431 मीटर),
      3. अचलगढ़ (1370 मीटर),
      4. रघुनाथगढ़ (1055 मीटर),
      4. खौ (920 मीटर),
      5. तारागढ़ (873 मीटर),
      6. बाबाई (792 मीटर),
      7. भैराच (792 मीटर)
      8. बैराठ (704 मीटर)
      अरावली पर्वत क्रम का विस्तार बाँसवाड़ा, सिरोही, जयपुर, अजमेर, सीकर और अलवर जिलों में है।
      इस पर्वत श्रृंखला को चार भागों में बाँटा जा सकता है:-
      1. उत्तरी-पूर्वी पर्वत श्रेणी 
      2. मध्य अरावली पर्वत श्रेणी

             इसे पुन: दो भागों में बाँटा जा सकता है:-

         () शेखावटी निम्न पहाड़ियाँ
          () मेरवाड़ पहाड़ियाँ
      3. मेवाड़ पहाड़ियाँ और भोराट पठार

      4. आबू पर्वत श्रृंखला

      1. उत्तरी-पूर्वी पहाड़ी प्रदेश -
      इसका विस्तार जयपुर जिले के उत्तरी-पश्चिमी भागों में तथा अलवर जिले के अधिकांश भागों में है। अरावली के इस भाग में चट्टानी एवं प्रपाती पहाड़ियों के कई समानान्तर कटक शामिल हैं। अरावली का यह भाग फाइलाईट तथा क्वार्टज से निर्मित है। इस क्षेत्र में दिल्ली क्रम की अन्य चट्टानें चूने के पत्थर से निर्मित है। दिल्ली के दक्षिण में स्थित पहाड़ियों की ऊँचाई समुद्रतल से लगभग 306 मीटर है। अन्य प्रमुख पहाड़ियों में भैराच (792 मीटर), बैराठ (704 मीटर) अलवर जिले में, बाबाई (792 मीटर)खौ (920 मीटर) जयपुर जिले में तथा रघुनाथगढ़ (1055 मीटर) सीकर जिले में है।
      2. मध्य अरावली पर्वत श्रेणी - 
      यह पर्वत श्रृंखला जयपुर, अजमेर तथा टोंक जिलों के दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित है। यह अरावली पर्वत क्रम का मध्यवर्ती भाग है। इसमें पश्चिम में बिखरे कटक, अलवर पहाड़ियाँ, करोली उच्च भूमि तथा बनास मैदान शामिल है।
      इसे निम्नांकित दो भागों  में विभाजित किया जा सकता है-
             () शेखावटी निम्न पहाड़ी प्रदेश             () मेरवाड़ पहाड़ी प्रदेश
            () शेखावटी निम्न पहाड़ी प्रदेश-
      इस प्रदेश में सबसे लंबी पर्वत श्रेणी झुंझुनू जिले में सिहना तक जाती है, जो सांभर झील से प्रारंभ होती है। इनके अतिरिक्त यहाँ कई छोटी-छोटी पहाड़ियां हैं जिनमें नाहरगढ़, पुराना धाट, आड़ा, डूंगर, तोरावाटी, राहोड़ी आदि हैं। इस प्रदेश की औसत ऊँचाई 400 मीटर है।

            () मेरवाड़ पहाड़ी प्रदेश-

      यह पर्वत श्रेणी मारवाड़ के मैदान को मेवाड़ के उच्च पठार से अलग करती है तथा यह अजमेर के निकट प्रकट होती है। अजमेर में स्थित तारागढ़ (870 मीटर) इस प्रदेश का प्रमुख पर्वत है इसके पश्चिम में नाग पहाड़ है। इस प्रदेश की औसत ऊँचाई 550 मीटर है। ब्यावर तहसील में अरावली श्रेणियों के चार दर्रे स्थित है जिनके नाम हैं -  बर, परवेरिया और शिवपुर घाट, सूरा घाट दर्रा और देबारी।

      3. मेवाड़ पहाड़ियाँ और भौराट पठार -

      मेवाड़ पहाड़ियाँ और भौराट पठार पूर्वी सिरोही, उदयपुर के पूर्व में संकीर्ण पट्टी को छोड़कर लगभग संपूर्ण उदयपुर और डूंगरपूर जिलों में विस्तृत है। इस भाग के पूर्व में अरावली के पर्वत भ्रशोत्थ के रुप में 1530 मीटर तक है। इस भू-भाग में वलन की सामान्य संरचना उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की तरफ समनति वलनों के नति लम्ब के सहारे प्रकट होती है। इस भाग की औसत ऊँचाई 1225 मीटर है। इसका सर्वाधिक उच्च शिखर जरगा पर्वत (1431 मीटर) है। इस क्षेत्र की अन्य श्रेणियाँ कुम्भलगढ़ (1224मीटर), लीलागढ़ (874मीटर), कमलनाथ की पहाड़ियाँ (1001मीटर) तथा सज्जनगढ़ (938 मीटर) है। उदयपुर के उत्तर-पश्चिम में कुम्भलगढ़ और गोगुन्दा के बीच एक पठारी क्षेत्र हैं जिसे ‘भोराट का पठार’ के नाम से जाना जाता है। भोराट पठार और उसकी समीपवर्ती कटकें संश्लिष्ठ गाँठ जैसा प्रतीत होती है। इस पठार के पूर्व की ओर कई पर्वत स्कन्ध हैं जिनमें दक्षिण सिरे का पर्वत स्कन्ध (500-600 मीटर) महत्त्वपूर्ण है।

       4. आबू पर्वत क्रम -

      यह पर्वत क्रम अरावली श्रृंखला के दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित है। यह सिरोही जिले में पहाड़ियों के गुच्छे के रुप में विद्यमान है। आबू पर्वत की लम्बाई 19 किलोमीटर  और चौडाई 8  किलोमीटर है तथा यह समुद्रतल से 1200 मीटर ऊँचा है। आबू से सटा हुआ उड़िया पठार आबू से लगभग 160 मीटर ऊँचा है तथा गुरु शिखर के मुख्य शिखर के नीचे है। यहां की प्रमुख पर्वत चोटियां गुरु शिखर (1727 मीटर), सेर (1597 मीटर), अचलगढ़ (1380 मीटर), देलवाड़ा (1442मीटर), आबू (1295 मीटर) और ऋषिकेश (1017मीटर) आदि हैं। आबू के पश्चिम में आबू-सिरोही की श्रेणियां है। यह पहाड़ियां आबू श्रेणियों की अपेक्षा अत्यंत निम्न है एवं  पश्चिम में जाने पर ये श्रेणियां छितरी पहाड़ियों के रुप में मिलती है किन्तु गुजरात के पालनपुर तक पहुँचते-पहुँचते घनी हो जाती है।
      अरावली पर्वत प्रदेश पूर्व में आर्द्र जलवायु क्षेत्र तथा पश्चिम में शुष्क जलवायु क्षेत्र के बीच में स्थित होने के कारण यह एक संक्रमणक क्षेत्र  है। राजस्थान के एकमात्र हिल-स्टेशन आबू पर्वत पर गीष्म ॠतु में अत्यंत सुहावनी ठंडक होती है जबकि शीत ॠतु में यहाँ अत्यंत ठंडक रहती है। जनवरी के महीने में यहाँ का तापमान प्राय: 10-16 डिग्री सेल्सियस तथा जून में 30 डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है। इस क्षेत्र में सापेक्षिक आद्रता ग्रीष्म ॠतु में 28 प्रतिशत रहती है। अरावली पर्वत प्रदेश में वर्षा की मात्रा उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में 80 से.मी. तक तथा दक्षिणी भागों में आबू पर्वत पर 150 से.मी. होती है। यहाँ सामान्यत: बरगद, जामून, आम, धौकड़ा, गूलर, बबूल खैर आदि के वृक्ष पाए जाते हैं।

      अरावली का अन्य विभाजन-

      एक अन्य तरीके से अरावली पर्वत प्रदेश को निम्नांकित तीन प्रमुख उप-प्रदेशों में भी विभक्त किया जाता है, ये हैं-

      (अ) दक्षिणी अरावली प्रदेश-

      इसमें सिरोही, उदयपुर और राजसमंद जिले के पर्वत शामिल किये जाते हैं। यह प्रदेश पूर्णतया पर्वतीय प्रदेश है, जहाँ अरावली की श्रेणियाँ अत्यधिक सघन एवं उच्चता लिये हुए हैं। इस प्रदेश में अरावली पर्वतमाला के अनेक उच्च शिखर स्थित हैं। इसमें गुरुशिखर पर्वत राजस्थान का सर्वोच्च पर्वत शिखर (ऊँचाई 1722 मीटर) सिरोही जिले में माउन्ट आबू क्षेत्र में स्थित है। यहाँ की अन्य प्रमुख उच्च पर्वत चोटियाँ हैं- सेर, अचलगढ़, देलवाड़ा, आबू और ऋषिकेश (सभी माउंट आबू) एवं उदयपुर-राजसमंद क्षेत्र में जरगा पर्वत, कुम्भलगढ़ , लीलागढ़, कमलनाथ की पहाड़ियाँ तथा सज्जनगढ़ है तथा उदयपुर के उत्तर-पश्चिम में कुम्भलगढ़ और गोगुन्दा के बीच एक पठारी क्षेत्र है जिसे भोराट का पठारके नाम से जाना जाता है।

      (ब) मध्य अरावली प्रदेश-

      यह मुख्यतः अजमेर जिले में फैला है। इस क्षेत्र में पर्वत श्रेणियों के साथ संकीर्ण घाटियाँ और समतल स्थल भी स्थित है। इसमें अजमेर के तारागढ़ एवं नाग पहाड़ शामिल हैं।

      (स) उत्तरी अरावली प्रदेश-

      इस क्षेत्र का विस्तार जयपुर, दौसा तथा अलवर जिलों में है। इस क्षेत्र में अरावली की श्रेणियाँ अनवरत न होकर दूर-दूर होती जाती हैं। इनमें शेखावाटी की पहाडियाँ, तोरावाटी की पहाड़ियों तथा जयपुर और अलवर की पहाड़ियाँ शामिल हैं।
      अरावली का महत्त्व -
      अरावली विश्व के प्राचीनतम पर्वतों में से एक है। अत: भौगोलिक अध्ययन के लिए यहां पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। इसकी उच्चतम चोटी गुरु शिखर ग्रीष्मकाल में एक शीतल प्रदेश बन जाती है एवं भारत के मध्यवर्ती भाग में यह सबसे ऊँची चोटी है। इसके अतिरिक्त यह अरब सागर से उठने वाले मानसूनों को रोकता है जिससे इसके पूर्वी प्रदेश में वर्षा हो जाती है परंतु पश्चिमी प्रदेश शुष्क रह जाता है। अरावली से एक अन्य लाभ यह भी है कि यह पश्चिमी रेगिस्तान से चलने वाली रेतीले आँधियों को पूर्वी भाग में आने से रोकता है।
      अरावली पर्वत को खनिजों का भी भण्डार गृह भी कहा जाता है। इससे इमारती पत्थर तथा अन्य कई उपयोगी खनिज प्राप्त किए जाते हैं। अरावली से कुछ नदियां निकलती है जो केवल वर्षा ॠतु में प्रवाहित होती है तथा ग्रीष्मकाल में शुष्क हो जाती है। अरावली पर्वत के पूर्वी ढलान पर घने वन पाए जाते हैं जिनसे जलाने फर्नीचर के लिए लकड़ी, गोंद, लाख, शहद, मसाले आदि अनेक उपयोगी वस्तुएं प्राप्त होती हैं अरावली के ढालों पर चारागाह भी उपस्थित हैं। अरावली पर्वत पर कई दर्शनीय स्थल यथा- माउण्ट आबू, उदयपुर, कुम्भलगढ़, चित्तौड़, आमेर, रणकपुर, हल्दी घाटी आदि स्थित है


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