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Tarkashi or Inlaying in wood: Famous Rajasthani Artifact तारकशी - राजस्थान की एक प्रसिद्ध कला

January 09, 2017

तारकशी या इनले वर्क ऑन वुड - राजस्थान की एक प्रसिद्ध कला

जयपुर में 'इनले वर्क ऑन वुड या तारकशी की कला' मध्यकाल से प्रचलित था। लकड़ी पर तारकशी की कला एक अनुपम कला है। तारकशी के कलात्मक कार्य के प्राचीन नमूनों को राजस्थान के पुराने महलों, हवेलियों आदि के दरवाजों, झरोखों की खिडकियों के अलावा सिंहासनों, फर्नीचर, हाथी के हौदों और घोड़े या ऊंट की काठी एवं अन्य कलात्मक वस्तुओं में देखा जाता है।

तारकशी एक प्रकार की काष्ठकला है। तारकशी का शाब्दिक अर्थ "तार को कसना" है, अर्थात इस कला में तार को लकड़ी के अन्दर जड़ा जाता है। अंग्रेजी में इसे Inlaying in wood कहा जाता है जिसका अर्थ "लकड़ी में तार जड़ना" है। तारकशी के काम को दृढ़ एवं उच्च तैलीय लकड़ी पर ही किया जा सकता है, क्योंकि दृढ एवं उच्च तैलीय लकड़ी में तार को कसने या जड़ने से तार ढीला नहीं पड़ता है। अतः 'इनले वर्क' में शीशम एवं अन्य पेड़ की दृढ़ लकड़ी प्रयुक्त की जाती है। इस कला में लकड़ी पर तारों द्वारा कलात्मक पैटर्न बनाया जाता है। यह पैटर्न आमतौर पर जटिल ज्यामितीय रूपों या मुगल कला के फूलों-पत्तियों की डिज़ाइन का बनाया जाता है। इसमें लकड़ी के ऊपर उपयुक्त डिज़ाइन का चित्रांकन करके फिर छैनी व हथौड़े की सहायता से उसे 1 मिमी की गहराई तक उकेरा जाता है और तत्पश्चात उसके ऊपर तारों के माध्यम से कला को अंतिम रूप दिया जाता है। इसमें धातु की चादर से पतली-पतली स्ट्रिप्स काट कर एक लौ पर गर्म किया जाता है तथा एक-जैसा व सीधा किया जाता है। फिर इस धातु पट्टी को पूर्व में बने खांचे में हथौड़े से पीट कर जमाया जाता है। इस कला में छोटे-छोटे कुंडलित डॉट जैसे रूपों, जिन्हें ''भिरियां'' कहा जाता है, को लकड़ी में सीधे ही पीट कर जमाया जाता है। भिरियां तारकशी का एक अद्वितीय तत्व है।

लकड़ी की सतह को रेतमाल या पत्थर की सिल्ली से घिस कर समतल करने के बाद लकड़ी में मौजूद गैप को भरने के लिए शीशम की लकड़ी के बारीक़ बुरादे को ऐडहेसिव के पतले घोल में मिला कर इस तरह तब तक लगाया जाता है कि जब तक सभी अंतराल भर न जाए। अब इसे जल आधारित एमरी कागज के द्वारा घिस कर समतल व चिकना किया जाता है और फिर चिकनी पॉलिश देने के लिए मशीन से बफ किया जाता है।

इस कला में फूल पत्तियों, डबल जाल की डिजाइन, लोटे का डिजाइन आदि तथा बार्डर में लहरिया, मटरमाला आदि का डिजाइन बनाया जाता है। तारकशी की कला में अत्यंत बारीक कार्य किया जाता है जिसका प्रमाण यह है कि इसमें प्रत्येक घन सेंटीमीटर के इनले कलात्मक वस्तु में धातु व लकड़ी के 250 टुकड़े तक जड़े हो सकते हैं।
लकड़ी पर तारकशी की इस कला में पीतल, तांबा और चांदी के तारों का उपयोग किया जाता है। इनले की कला सफाविद युग में अत्यंत विकसित किया गया था, जिसके दौरान कलाकारों ने दरवाजे, खिड़कियां, दर्पण के फ्रेम, कुरान बक्से, जड़ाव आभूषण बक्से, कलम और पेन स्टेंड, लालटेन और अलंकृत मंदिरों आदि का बहुमूल्य कलात्मक कार्य किया गया। कहा जाता है कि तारकशी कला के जयपुर के कारीगर वस्तुतः उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के कुशल श्रमिकों के वंशज हैं, जो महाराजा जयसिंह द्वितीय के शासनकाल के दौरान यहां आए थे।
इस कला में तारकशी द्वारा लकड़ी के दरवाजे, टेबल, आभूषण (ऑर्नामेन्ट) बॉक्स, फूलदान, टेबल लैम्प, छोटे डिब्बे (बॉक्स), पेन स्टेण्ड, पेपरवेट, की-चैन, हाथी, ऊंट व अन्य जानवर और पक्षी आदि कई प्रकार की सजावटी सामग्री को तैयार किया जाता है।  जयपुर में कई कलाकार इनले वुड वर्क करके इस कला को जीवंत बनाए हुए हैं। इनके द्वारा तारकशी से तैयार सजावटी बॉक्स, हाथी, मूर्तियां आदि काफी मात्रा में विदेश में निर्यात की जाती है। जयपुर के राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार से सम्मानित हस्तशिल्पि श्री रामदयाल शर्मा (राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार-2009), मोहनलाल शर्मा (राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार-2013) आदि ’’इनले वर्क ऑन वुड‘‘ कला में पारंगत कलाकार है। श्री रामदयाल शर्मा को कई पुरस्कार व सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। उनके द्वारा बनाई तारकशी निर्मित कलात्मक सामग्री देश-विदेश के पर्यटकों द्वारा काफी मात्रा में खरीदी जाती है। श्री रामदयाल शर्मा को 1983 स्टेट मैरिट अवार्ड, 1985 में स्टेट अवार्ड, 2008 में नेशनल मैरिट अवार्ड तथा 2009 में अपनी तारकशी कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भारत सरकार द्वारा नवाजा जा चुका है। जयपुर के सिटी पैलेस में महाराजा सवाई भवानी सिंह द्वारा 1997 में शर्मा को अपनी कला के प्रदर्शन के लिए जगह दी गई थी, वहां आज तक इस कला का प्रदर्शन किया जा रहा है, जिसे सिटी पैलेस में आने वाले विदेशी खूब सराहते है।
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