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Agricultural practices in Rajasthan राजस्थान की कृषि पद्वतियां

June 29, 2018

Agricultural practices in Rajasthan - राजस्थान में कृषि पद्वतियां

राजस्थान की कृषि मूलत: वर्षा आधारित है लेकिन सिंचाई के साधनों निरंतर वृद्धि के कारण यहाँ पर विभिन्न खाद्यान्न व व्यापारिक फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। राजस्थान की भौतिक जलवायुगत सामाजिक-आर्थिक दशाआें की विविधताओं के कारण कृषि पद्वति परम्पराओं साधनों आदि में स्थानिक भिन्नता पाई जाती है। राज्य में कृषि का आर्थिक दृष्टि से नहीं वरन् सामाजिक दृष्टि से भी महत्त्व है।
वर्तमान में राज्य की कुल आय का लगभग 50 प्रतिशत एवं पशुपालन से ही प्राप्त होता है। क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है। कृषि क्षेत्र की दृष्टि से इसका देश में चौथा स्थान है। राजस्थान में देश के कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत भाग है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 48.30 प्रतिशत शुद्ध बोया गया क्षेत्र है। यहाँ की कृषि मुख्यतः वर्षा आधारित है। यहाँ की कृषि में स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है। यहाँ पर कृषि राष्ट्रीय आय का साधन, जीवन का आधार, रोजगार का प्रमुख साधन, खाद्यान्न प्राप्ति का स्रोत तथा द्वितीयक व तृतीयक व्यवसायों के विकास में सहायक है।
राजस्थान की कृषिगत अर्थव्यवस्था मूलत: अस्थिर (Unstable) कही जा सकती है। राज्य का तिलहन, धनिया, जीरा, कपास, ईसबगोल, मेथी, जौ, मूंगफली, मिर्ची, बाजरा के उत्पादन में प्रथम स्थान है।

राज्य की कृषि की प्रमुख विशेषताएँ - 

  • मानसून का जुआ, 
  • खाद्यान्न फसलों की अधिकता,
  • गत दशक में व्यापारिक फसलों की ओर रुझान में वृद्धि, 
  • कृषि क्षेत्र वितरण में असमानता, शुष्क कृषि की अधिकता, 
  • मानवीय श्रम का आधिक्य,
  • जोत का छोटा आकार,
  • खाद व उर्वरकों का अपेक्षाकृत कम उपयोग आदि।
राज्य की भौगोलिक विषमताओं के कारण यहाँ पर कृषि में क्षेत्रीय आधार पर स्थानिक विविधता पाई जाती है। अलग अलग क्षेत्रों में कृषि अलग-अलग प्रकार से की जाती है।
राज्य में कृषि के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित है-

(1) 'वालरा' या 'झूमिंग' कृषि पद्वति (Jhuming or Walra Farming) :-

राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भागों में भीलों गरासिया डामोर आदि द्वारा जंगलों को जलाकर उस राख युक्त (फास्फोरसमय) स्थान पर मक्का आदि की फसल वर्षा होने पर मेवाड़ एवं बागड़ प्रदेश में की जाती रही है। इनमें दो तीन वर्ष तक फसल प्राप्त करने के खेत को छोड़कर इसी प्रकार की कृषि को राजस्थान में 'वालरा', आसाम में ‘झूमिंग‘, मध्यप्रदेश में 'कुमारी‘ कहते हैं। यह आदिवासी, रूढिगत तथा अविकसित कृषि पद्वति है। इससे जंगल नष्ट होने के कारण पर्यावरण की समस्या भी बढी है। अब जंगल कम होने से 'वालरा' कृषि भी बहुत कम हो गई है। 

(2) शुष्क  खेती  (Dry Farming) :-

राजस्थान के अरावली के पश्चिमी एवं संक्रमण क्षेत्र (Transitional Zones) में जहाँ 50 से.मी. से कम औसत वार्षिक वर्षा होती है ‘शुष्क कृषि पद्वति‘‘ की जाती है। यह पद्वति जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनू, चुरू, बीकानेर, जोधपुर, पाली, नागौर,  टोंक, करौली आदि  में प्रचलित है। इस में वर्षा होने के साथ ही खेती की जुताई-बुवाई की प्रारम्भ कर देते हैं तथा आवश्यकतानुसार बुवाई-जुताई की जाती है तथा संरक्षित नमी को जुताई के द्वारा उपर उभारा जाता है तथा उस खेत में पटेला चलाकर उसे समतल कर दिया जाता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया दोहराने से नमी को संरक्षित (Conserve) कर लिया जाता है एवं फसल बोने के लिए उपयुक्त तापमान तथा मौसम आने पर बुवाई कर दी जाती है यही ‘‘शुष्क खेती‘‘ कहलाती है। 

 

(3) सिंचित कृषि (Irrigated Farming) :-

10 से 50 सेन्टीमीटर वर्षा वाले स्थानों में जहाँ फसल की सिंचाई नहरों, कुओं, बाँधों, तालाबों से पानी की पूर्ति आवश्यकता होती है ‘‘सिंचित खेती‘‘ की जाती है। श्रीगंगानगर, हनुमानगढ, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ, प्रतापगढ़, अजमेर,पाली, भीलवाड़ा, उदयपुर, डूंगरपुर, राजसमन्द आदि जिलों में सिंचित कृषि की जाती है।
(4) आर्द्र कृषि (Humid Farming)  :-
जिस मिट्टी में अधिक समय तक पानी रूक सकता है उन क्षेत्रों में यह कृषि पद्वति प्रचलित है। जहाँ 100 से.मी. की जाती है। कोटा, बारां, बाँसवाड़ा, झालावाड़, बनास एवं साबरमती नदी के कुछ भागों में इसी प्रकार की खेती की जाती है। यह काली एवं कांपीय मिट्टी का क्षेत्र है तथा इसमें चावल, कपास, गेहूँ उद्यान फसलें, गन्ना, मक्का, ज्वार, अरहर आदि की फसलें होती है।

 

(5) मिश्रित  खेती  :-

इस प्रकार की कृषि में कई फसलों को एक साथ मिलाकर बोया जाता है जैसे गेहूँ व चना आदि अर्थात् खेती का वह ढंग है जिसमें कृषक एक समय में एक खेत में एक से अधिक फसलों को बोकर खेती करते हैं। विभिन्न फसलाें के बीज तीन प्रकार से बोए जाते हैं -

(1) बीजों कतारों में बोना 
(2) बीजों को मिलाकर फिर छिड़ककर बोना 
(3) सहचर क्रियाओं के माध्यम से। 

 

मिश्रित खेती और मिश्रित कृषि में अंतर-

मिश्रित खेती मिश्रित कृषि से भिन्न होती है। मिश्रित कृषि (Mixed  Farming) में फसलोंत्पादन के साथ-साथ दूधारू पशुओं जैसे गाय-भैंस को पाला जाता है जिसमें फसलोत्पादन व पशुपालन एक दूसरे के पूरक व्यवसाय कहे जाते हैं।

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निर्माण श्रमिक सुलभ्य आवास योजना

June 23, 2018

निर्माण श्रमिक सुलभ्य आवास योजना

हितलाभ-

1. हाउसिंग फाॅर आॅल मिशन (अरबन) अथवा सरकार की अफोर्डेबल हाउसिंग योजना अथवा मुख्यमंत्री जन आवास योजना अथवा केन्द्र/राज्य सरकार की अन्य किसी आवास योजना के पात्र हिताधिकारियों को, संबंधित योजना के प्रावधानानुसार, मण्डल द्वारा अधिकतम् 1.50 लाख रूपये तक की सीमा में अनुदान।

2. स्वयं के भूखण्ड पर आवास का निर्माण करने की स्थिति में अधिकतम 5 लाख रूपये निर्माण लागत की सीमा में, वास्तविक निर्माण लागत का 25 प्रतिशत तक, अनुदान।

वरीयता (योजना की अन्य शर्तें पूरा करने की स्थिति में) -

(i) बीपीएल श्रेणी के हिताधिकारी को,

(ii) अनु. जाति/अनु. जन जाति के हिताधिकारी को,

(iii) विशेष योग्यजन को

(iv) केवल दो पुत्रियाँ वाले हिताधिकारियों को

(v) पालनहार योजना में आने वाली महिला/परिवार को

(vi) तथा एक से अधिक वर्षाें अर्थात्, 2, 3 या 4 वर्षों से मण्डल में पंजीकृत हिताधिकारी को वरीयता दी जावेगी।

पात्रता एवं शर्ते-

1. मण्डल में कम से कम 1 वर्ष से हिताधिकारी के रूप में पंजीकृत निर्माण श्रमिक हो;

2. यदि स्वयं के भूखण्ड पर आवास बनाता है तो भूखण्ड पर स्वयं का या पत्नी/ पति का मालिकाना हक हो तथा उक्त भूखण्ड/सम्पत्ति विवाद रहित, बंधक रहित हो;

3. वित्तीय संस्था/बैंक से ऋण लेने के अतिरिक्त, स्वयं की बचत या अन्य स्त्रोत से ऋण लेकर आवास का निर्माण करने की स्थिति में, आवास की अनुमानित निर्माण लागत का प्रमाणिकरण पंचायत अथवा नगर पालिका के कनिष्ठ अभियन्ता या उससे उच्च अभियन्ता से प्राप्त करना आवश्यक होगा;

4. यदि हिताधिकारी अथवा उसकी पत्नि/पति अथवा आश्रित पुत्र या पुत्री के नाम पर/मालिकाना हक में पहले से कोई आवास है तो ऐसे हिताधिकारी को इस योजना में अनुदान/सहायता देय नहीं होगी;

5. आवास का मालिकाना हक पति व पत्नी दोनों के संयुक्त नाम में होगा;

आवेदन की समय सीमा- 

योजनानुसार वर्ष में कभी भी।

आवेदन के साथ लगाये जाने वाले दस्तावेज 

1. बीपीएल श्रेणी के प्रमाण पत्र/कार्ड की प्रति (यदि लागू हो तो)।
2. अनु.जाति या अनु.जन.जाति प्रमाण पत्र की स्वप्रमाणित प्रति (यदि लागू हो तो)।
3. विशेष योग्यजन प्रमाण पत्र की स्वप्रमाणित प्रति (यदि लागू हो तो)।
4. पालनहार योजना में आने वाली महिला/परिवार प्रमाण पत्र की स्वप्रमाणित प्रति (यदि लागू हो तो)।
5. केवल दो पुत्रियाँ हो तो इस आषय के प्रमाण पत्र की प्रति (यदि लागू हो तो)।
6. वार्षिक आय, प्रमाण पत्र की स्वप्रमाणित प्रति (रूपयों में)।
7. भूखण्ड पर स्वयं का या पत्नि/पति का मालिकाना हक होने का प्रमाण/दस्तावेज की स्वप्रमाणित प्रति (यदि लागू हो तो)।
8. प्लाट/भूखण्ड के सभी प्रकार के विवादों से मुक्त होने का राजस्व अधिकारी से प्राप्त संबंधित दस्तावेज की स्व-प्रमाणित प्रति। (यदि लागू हो तो)
9. सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा अनुमोदित विस्तृत आकलन/प्राक्कलन तथा ले-आउट प्लान की स्वप्रमाणित प्रति (यदि लागू हो तो)।
10 वित्तीय संस्थान/बैंक से आवास ऋण लेकर आवास निर्माण करने की स्थिति में संबंधित वित्तीय संस्थान/बैंक द्वारा जारी ऋण स्वीकृति पत्र की स्वप्रमाणित प्रति। (यदि लागू हो तो)
11 स्वयं की बचत या बैंक वित्तीय संस्था से भिन्न किसी अन्य स्त्रोत से ऋण लेकर आवास निर्माण करने की स्थिति में आवास की अनुमानित निर्माण लागत के प्रमाण-पत्र, जो पंचायत अथवा नगर पालिका के कनिष्ट अभियन्ता या उससे उच्च स्तर के अभियन्ता द्वारा जारी किया गया हो, की स्वप्रमाणित प्रति। (यदि लागू हो तो)
12. हिताधिकारी पंजीयन परिचय पत्र या कार्ड की प्रति
13. भामशाह परिवार कार्ड या भामाषाह नामांकन की प्रति
14. आधार कार्ड की प्रति
15. बैंक खाता पासबुक के पहले पृष्ठ की प्रति
हाउसिंग फार आल मिशन (अरबन) या सरकार की अर्फोडेबल हाउसिंग या मुख्यमंत्री जन आवास योजना या केन्द्र/राज्य सरकार की अन्य किसी आवास योजना के अन्तर्गत आवास प्राप्त करने की निर्धारित शर्ते व पात्रता पूरी करने के संबंध में वांछित दस्तावेज, की स्वप्रमाणित प्रति। (यदि लागू हो तो)

आवेदन पत्र डाउनलोड करें-


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Rajasthan Seeds Mini-kit Scheme- राजस्थान बीज मिनिकिट योजना

June 17, 2018

बीज मिनिकिट योजना
 
   

  • राज्य योजना, राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑयल पॉम मिशन तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत मिनिकिट वितरण       
  • मिनिकिट का आयोजन राजस्थान के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिए फसल की उपज एवं गुणवत्‍ता के आधार पर किस्म चयन में सहायक होती है।
  • कमजोर वर्ग के कृषकों को मिनिकिट के माध्‍यम से लाभान्वित किया जाता है।

पात्रता :-

  • मिनिकिट अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, लघु एवं सीमान्त तथा गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले कृषकों को प्राथमिकता से मिनिकिट का वितरण किया जाता है।
  • कुल लागत का 10 प्रतिशत टोकन मनी के रूप में कृषक से वसूल कर मिनिकिट वितरण किये जाते हैं।
  • मिनिकिट महिला के नाम से दिये जाते है, चाहे भूमि महिला के पति/पिता/ससुर के नाम से हो।
  • एक महिला को मिनिकिट का एक ही पैकेट दिया जायेगा।
  • एक ही कृषक परिवार की अलग-अलग कृषक महिला सदस्य के नाम से मिनिकिट नहीं दिए जाएंगे।
  • यदि किसी ग्राम पंचायत में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के कृषक उपलब्‍ध नहीं हो तो सामान्य श्रेणी के महिला कृषकों में मिनिकिट वितरण किया जा सकता है।
  • मिनिकिट्स हेतु ऐसे कृषकों का चयन किया जाएगा, जिन्हें गत तीन वर्ष में मिनिकिट कार्यक्रम में लाभान्वित नहीं किया गया हो।
  • सिंचाई की सुविधा वाले कृषकों को प्राथमिकता जाती है।



आवेदन प्रक्रिया :-

  • सहायक निदेशक कृषि विस्तार के कार्यालय में सम्बन्धित ग्राम पंचायत के कृषि पर्यवेक्षक के माध्यम से।
  • चयन हेतु पात्र महिलाओं की सूची कृषि पर्यवेक्षक द्वारा सम्बिन्धित ग्राम पंचायत के सरपंच एवं अन्य निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के साथ विचार विमर्श कर ग्रामवार बनाई जाएगी।
  • चयन हेतु पात्र महिला कृषकों की सूची कृषि पर्यवेक्षक द्वारा लक्ष्य से 3 गुना अधिक महिलाओं की सूची बनाई जाती है तथा पात्र महिलाओं का चयन लाटरी पद्धति से किया जाने का प्रावधान है।

समय अवधि :-

  • बुवाई समय 15 दिन से पूर्व।

कहां सम्पर्क करें :-

  • ग्राम पंचायत स्तर पर :- कृषि पर्यवेक्षक
  • पंचायत समिति स्तर पर :- सहायक कृषि अधिकारी
  • उप जिला स्तर पर :- सहायक निदेशक कृषि (विस्तार) / उद्यान कृषि अधिकारी।
  • जिला स्तर पर :- उप निदेशक कृषि (विस्तार) / उपनिदेशक उद्यान।
Source- http://www.agriculture.rajasthan.gov.in
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Agriculture Schemes of Rajasthan - प्रमाणित बीज वितरण हेतु अनुदान सहायता

June 17, 2018

प्रमाणित बीज वितरण हेतु अनुदान सहायता

फसल उत्‍पादन में गुणवत्‍तायुक्‍त /प्रमाणित बीज का प्रमुख योगदान है। इससे ना केवल प्रति इकाई फसल उत्‍पादन में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होती है, अपितु फसल उत्‍पादन के अन्‍य आदानों यथा उर्वरक, सिचाई आदि का भी समुचित उपयोग होता है।

देय लाभ :-

विभाग द्वारा संचालित विभिन्‍न योजनाओं के तहत प्रमाणित बीज वितरण पर देय लाभ का विवरण निम्‍नानुसार है।
1     दलहनी फसले (मूंग, मोठ, उडद, अरहर, चना)-
  •  15 वर्ष तक की अवधि की अधिसूचित किस्‍मों के बीज की कीमत का 50 प्रतिशत अ‍थवा रूपये 2500 प्रति क्वि. जो भी कम हो
2     मोटा अनाज (बाजरा, ज्‍वार, मक्‍का, जौ) की किस्‍में-     
  •  सामान्य किस्‍में- 
 10 वर्ष से कम अ‍वधि की अधिसूचित किस्‍मों के बीज की कीमत का 50 प्रतिशत अ‍थवा रूपये 1500 प्रति क्वि. जो भी कम हो
  • संकर किस्‍में - 
10 वर्ष से कम अ‍वधि की अधिसूचित किस्‍मों के बीज की कीमत का 50 प्रतिशत अ‍थवा रूपये 5000 प्रति क्वि. जो भी कम हो।
3     गेहूं एवं धान-     
  • 10 वर्ष से कम अ‍वधि की अधिसूचित किस्‍मों के बीज की कीमत का 50 प्रतिशत अ‍थवा रूपये 1000 प्रति क्वि. जो भी कम हो
4     ग्‍वार -    
  • 10 वर्ष से कम अ‍वधि की अधिसूचित किस्‍मों के बीज की कीमत का 50 प्रतिशत अ‍थवा रूपये 1200 प्रति क्वि. जो भी कम हो।
5     तिलहनी फसले (सोयाबीन, मूंगफली, तिल, अरण्‍डी, सरसो) -    
  • सामान्य किस्‍में- 
15 वर्ष तक की अ‍वधि की अधिसूचित किस्‍मों के बीज की कीमत का 50 प्रतिशत अ‍थवा रूपये 2500 एवं तिल हेतु रूपये 5000 प्रति क्विं., जो भी कम हो।
  • संकर किस्‍में-  
15 वर्ष तक की अ‍वधि की अधिसूचित किस्‍मों के बीज की कीमत का 50 प्रतिशत अ‍थवा रूपये 5000 प्रति क्वि., जो भी कम हो।

पात्रता :-

  • समस्‍त श्रेणी के कृषक जिले में जनसंख्‍या के अनुपात में
  • स्‍वपरागित फसल होने से तीन वर्ष में एक बार, परपरागित फसल हेतु दो वर्ष में एक बार एवं संकर किस्‍मों हेतु प्रति वर्ष अनुदान पर बीज प्राप्‍त किया जा सकता है।
  • दलहनी फसले, मोटा अनाज, गेहँ, धान एवं ग्‍वार फसल के तहत एक कृषक को अधिकतम 2 है0 क्षैत्र हेतु अनुदानित दर पर प्रमाणित बीज देय।
  • समस्‍त तिलहनी फसलों हेतु अधिकतम 5 है0 तक ही प्रमाणित बीज अनुदान पर उपलब्‍ध कराया जा सकता है। अनुदानित बीज पहले आओ पहले पाओं के सिदान्‍त पर उपलब्‍ध

आवेदन प्रक्रिया :-

  • अनुदानित दर पर प्रमाणित बीज प्राप्‍त करने हेतु कृषक द्वारा संबधित कृषि पर्यवेक्षक/ सहायक कृषि अधिकारी कार्यालय में सम्‍पर्क करें।
  • प्रपत्र में संबधित कृषि पर्यवेक्षक/ सहायक कृषि अधिकारी से सिफारिश उपरान्‍त उनके क्षैत्र में कार्यरत ग्राम सेवा/ क्रय विक्रय सहकारी समिति/ सार्वजनिक क्षेत्र की बीज संस्‍थाओं के अधिकृत निजी विक्रेताओं से सिफारिश की गई फसल की किस्‍म का बीज अनुदानित दर पर प्राप्‍त कर सकते है।

समयावधि- 

  • खरीफ, रबी व जायद हेतु उपयुक्‍त बुआई समय अनुसार।

बीज प्राप्ति स्‍थल :-

  • ग्राम सेवा/ क्रय विक्रय सहकारी समिति/ सर्वाजनिक क्षेत्र की बीज संस्‍थाओं के अधिकृत निजी विक्रेता।



कहां सम्पर्क करें :-

  • ग्राम पंचायत स्तर पर :- कृषि पर्यवेक्षक कार्यालय
  • पंचायत समिति स्तर पर :- सहायक कृषि अधिकारी कार्यालय
  • उप जिला स्तर पर :- सहायक निदेशक कृषि (विस्तार) कार्यालय
  • जिला स्तर पर :- उप निदेशक कृषि (विस्तार) जिला परिषद कार्यालय
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Gyan Sankalp Portal and Mukhyamantri Vidya Dan Kosh - ज्ञान संकल्प पोर्टल एवं मुख्यमंत्री विद्या दान कोष

June 14, 2018

ज्ञान संकल्प पोर्टल एवं मुख्यमंत्री विद्या दान कोष
 

    • राजस्थान में राजकीय विद्यालयों को आर्थिक सहयोग प्रदान करने तथा आधारभूत संरचना के सुदृढ़ीकरण के लिए दानदाता अब शिक्षा विभाग द्वारा विकसित किए जाने वाले 'ज्ञान संकल्प पोर्टल' एवं 'मुख्यमंत्री विद्या दान कोष' के जरिए अपना सहयोग कर सकेंगे।
    • स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा बनाया जा रहा यह पोर्टल फंडिंग गेप को कम करने में मददगार साबित होगा।
    • पोर्टल एवं कोष का मुख्य उद्देश्य- राजकीय विद्यालयों की मूलभूत आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं के अनुसार सीएसआर, भामाशाहों, संस्थाओं व क्राउड फंडिंग के माध्यम से आवश्यक धनराशि का संग्रहण व प्रबंधन करना एवं विद्यालयों के विकास हेतु विभिन्न प्रोजेक्ट्स हेतु दानदाताओ का सहयोग प्राप्त करना हैं।
    • इस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भामाशाह और औद्योगिक घराने कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसेबिलिटी (सीएसआर) के तहत जुड़कर सीधे राजस्थान सरकार को शिक्षा में किए जा रहे नवाचारों एवं आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाने में अपना सहयोग दे सकते हैं।

      •  इस पोर्टल के माध्यम से भामाशाह व औद्योगिक घराने प्रदेश के विद्यालयों को सहयोग देने के उद्देश्य से गोद ले सकते हैं।
      • दानदाता अथवा सीएसआर कम्पनी परियोजना गतिविधि हेतु आवश्यक धनराशि उपलब्ध करवाकर राजस्थान माध्यमिक शिक्षा परिषद के माध्यम से परियोजना क्रियान्वित कर सकती हैं।
      • दानदाताओं द्वारा दिए जाने वाले योगदान का उपयोग राजस्थान माध्यमिक शिक्षा परिषद के द्वारा राज्य सरकार की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुसार विद्यालयों के विकास हेतु किया जावेगा।
      • मुख्यमंत्री विद्या दान कोष में दी गयी योगदान राशि को आयकर अधिनियम की धारा 80 (जी) के अन्तर्गत आयकर छूट प्रदान करने तथा विदेशी स्रोतों से योगदान प्राप्त करने के लिये 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगूलेशन एक्ट' के तहत पंजीकरण की आवश्यक कार्यवाही भी राज्य सरकार करेगी।
      •  ज्ञान संकल्प पोर्टल 5 अगस्त 2017 को लांच किया गया। 

      ज्ञान संकल्प पोर्टल

       

      Gyan Sankalp Portal and Mukhyamantri Vidya Dan Kosh - ज्ञान संकल्प पोर्टल एवं मुख्यमंत्री विद्या दान कोष Gyan Sankalp Portal and Mukhyamantri Vidya Dan Kosh - ज्ञान संकल्प पोर्टल एवं मुख्यमंत्री विद्या दान कोष Reviewed by asdfasdf on June 14, 2018 Rating: 5

      GAVRI - The Incredible Merumatyam of Rajasthan

      June 13, 2018
      Tribal art, as we have seen, is not art for the sake of art, but a very important part of tribal life. It is a reflection of their cultural environment, and is thus closely related to its other constituents like dance, drama, music, etc. It does not have a separate identity. In fact, none of these constituents exists alone in tribal life. They have a close rapport with one another. In the life of the aboriginals, we find that they don't co-exist, but are integral forms of one art. As it has been said. 
      Whatever the occasion, they draw on the walls. At the same time, the atmosphere being" festive and everyone being- gay, there is dancing and singing, which is immediately reflected in the painting. 
      As we all know, food is most important in life, something that keeps the blood circulating. It would not be an exaggeration to say that dance and music are almost as important as food in the tribal's life. Every night, regularly, these folks dance and sing songs. Perhaps it is a means to break the monotony and fatigue of the day's work and also an easy and handy entertainment. On any special occasion, their enthusiasm is incomparable. They are so engrossed in dancing and singing that they forget their ill feelings, and enjoy themselves till the dawn breaks. These occasions also inspire them to compose songs spontaneously. It is not necessary that a song should contain some deep and profound meaning. There are some festival songs which have been sung for generations. All arts thus have an important place, as each would be handicapped without the other. They have the necessary musical instruments too.
      The Bhils have various types of dance and numerous musical instruments. Ger dance (गैर नृत्य) is similar to Dandia-dance ( डांडिया) and performed during the Holi
      festival throughout the night. Their instruments are flute, drum (huge and small), mandal, chang, thah, etc. 

      'Gauri' or Gavri-

      'Gauri (Gavri गवरी) is a Merunatyam (मेरुं नाट्यम) of the Bhils who have settled in Udaipur, Dungarpur and Banswada in Rajasthan. It is a dance drama, combining mime and dialogue, and is known as 'Gavri Nach or Rai Dance'. The plot is built round Lord Shiva, who is the central figure, depicted in a very strange form. The symbol of Shiva and Bhasmasura are Raiburia, Mohini and Parvati, symbolised by both the Rais, Kutkadiya and Pat Bhopa '. These five are the main characters of the dance drama and known as 'Maji'. Besides these, there are many other characters known as Kheliye.

      The scenes enacted are called 'Khel', Bhav or Sang. Kutkadiya is the compere who before each scene narrates the story in short, and this helps the audience to follow the play better. These stories are small parts organized around the main story. Any courtyard or any crossroad in the village is the stage. The performance begins early in the month of Bhadon (6th month of the Hindu year), and continues for about 4 to 5 weeks, from 9 a.m. to 6 p.m. every day. 
      Every Bhil village or 2 or 3 villages combined organize the presentation of the play. It is interesting that the villagers perform Gauri (Gavri) in the village or villages where their daughters and sisters are married.
      Every member of a Bhil family considers it as a religious duty to take part in Gauri (Gavri). That's how the number of characters can swell up to a hundred. Nowhere in India does one find a play being staged for such a long time, with so many characters, in such a collective way in various villages and with such marvellous organization.
      The story of Lord Shiva and Bhasmasur (भस्मासुर) is the original story of 'Gavri'. Bhasmasur, through his penance obtained 'bhasma-kada (भस्म-कड़ा)', with the help of which he wanted to reduce Lord Shiva to ashes. Lord Vishnu assumed the enchanting form of Mohini and reduced Bhasmasur himself to ashes. While burning to ashes, Bhasmasur begged Lord Vishnu to grant him the boon of immortality. The play celebrates this event. In the symbolic form of Bhasmasur, the main character 'Rai-Buria (राई-बूढिया)' wears on his face an extraordinarily artistic mask and is the central figure of 'Gauri (Gavri)'. In their life and art the Bhils do exhibit the influence of Hindu mythology. There are many stories and legends about the origin of the dance drama 'Gauri (Gavri)'. As the Bhils are the only ones who perform this play, it is important to know its relation to them.

      (a) It is believed that Lord Shiva is the main God of the Bhils. Hence they have adopted the most impressive incident in Shiva's life to display their ftiith and devotion. 
      (b) The Bhils have been Lord Shiva's most trustworthy of all worshippers. In remembrance of Bhasmasura and to keep hisimmortality, it was very necessary to select an individual who could be given Bhasmasura's skull and in his memory perform a group dance-drama. Lord Shiva considered it appropriate that the Bhil, who brought raddish every day to his seat of meditation, should perform 'Gauri'.

      (c) Parvati's father was Heemjal Bhil from Himachal. Hence the Bhils firmly believe that they are the only true worshippers of Shiva.

      (d) Lord Shiva made a 'mandal of rai', which he handed over to the Bhils, and this mandal is known as 'Rai' or 'Gauri', This legend confirms their belief that their association with Shiva is ancient, that they are his sole worshippers.

      There are 4 types of characters in 'Gavri', viz., gods, human beings, demons and animals.

      (a) The gods-

      The gods are the symbols of ideals. Lord Shiva and Parvati enter into human beings and help them, and console the grief-stricken and try to diminish their sorrows. With supernatural power they grant boons to help them accomplish their task.
             (b) Human Beings-
             We see any number of human characters in Gauri (Gavri)

      • Buria (बूडिया)
      • Kutkadiya कुटकड़िया
      • Kanjar-Kanjari कंजर-कंजरी
      • Mina मीणा
      • Nut नट
      • Khetudi खेतुड़ी
      • Shankariya
      • Kalbeliya
      • Kan-gujari
      • Bhopa 
      • Phatta-Phatti फत्ता-फत्ती
        There are others also.
           (c) The demon-
           The demon characters are cruel, sadistic and troublesome. On their heads are  horns and their appearance is horrible and inauspicious. They are Khadilya Bhut (खड़लिया भूत), Bhiyanwad or Hatya (भिंयावड या हटिया) Danav etc.

          (d)
      The animals-
         The animals of Gauri (Gavri) are not violent and ferocious. The pig, the bear and the lion are the chief ones. 
      The purpose behind celebrating 'Gauri (Gavri)' is not only entertainment, but mainly the performance of religious duty. And by pleasing 'Baba Bhairav-Nath (Shiva), they pray for security for the village and the villagers and safety from disease, sorrow, grief, poverty, famine, etc. Those who take part in the play find themselves so identified with the characters that their acting is superb. During- the period of the performance of Gauri (Gavri), all the actors refrain from women, wine and meat. The Bhil men and women have equal rights. But though the number of women characters in the play is quite large, it is interesting to note that no woman can take part in the play. All female roles are played by men. 
      Art and drama in 'Gauri (Gavri)' are inseparable. The artistic skill of the Bhils exhibits itself through dances, postures, histrionics, moulding and adorning an image, presentation, music and dialogue. The daily activities of these people are manifested here. The masks used in this play with their wonderful craftsmanship are an exceedingly artistic specimen of folk art. 
      Rai Buria, who is the main character of this play is recognized by his mask, which is quite huge and grand. As soon as he wears this mask, the heavenly spirit enters into 'Buria or Budiya' and the moment it is removed, he returns to his ordinary human state. These masks are decorated by sticking silver foliage and with colours. Each character has a different decorative embellishment to attract the attention of the audience.

      The main colours used arc black, blue, yellow and red. Various types of traditional masks are made for the Gauri
      (Gavri) festival. They are quite artistic. One more artistic creation produced on this occasion is the auspicious elephant of Gauri (Gavri) in clay. This beautifully decorated clay elephant is brought in on the last day of the festival at the time of the departure of Gauri. It is a beautiful ritual. This elephant is a symbol of Lord Shankar. It is said that while Bhasma-sur was running, the 'kada' fell from his hand and remained suspended in the air. Lord Shiva took it and wore it, and assuming the form of an elephant, plunged into a nearby pond. There is a grand celebration of this event. The elephant is decorated with silver ornaments, foliage, red, green, yellow and blue leaves and attractive glass pieces. And on it Shiva and
      Parvati are seated very artistically. Thus the dance-drama, 'Gauri
      (Gavri)' has a prestigious place in Bhil life. Of all the folk dramas found in folk literature, 'Gauri' is the only one which has all the qualities of an ideal folk drama. It is a unique and harmonious coordination of art, sculpture, dance, music, drama and culture.

      Reference- Lok Natya Gauri -- Udbhav and Vlkas by Dr. Mahendra Bhanavat, (Bharatiya Lok-Kala Mandal), p.2 

      GAVRI - The Incredible Merumatyam of Rajasthan GAVRI - The Incredible Merumatyam of Rajasthan Reviewed by asdfasdf on June 13, 2018 Rating: 5

      Terracotta art of Rajasthan- राजस्थान की मृण कला - राजस्थान की टेराकोटा कला

      June 09, 2018
      राजस्थान राज्य का सम्पूर्ण भू-भाग मृण कलाओं के लिए विशेष रूप से जाना जाता है तथा इनमें जैसलमेर का पोकरण, मेवाड़ का मोलेला व गोगून्दा तथा ढूंढाड़ व मेवात स्थित हाड़ौता व रामगढ़ की मिट्टी की कला की प्रसिद्धि देश में ही नहीं, अपितु विदेशों तक में फैली हुई है। मेवाड़ स्थित आहाड़ सभ्यता, गिलूण्ड, बालाथल आदि के साथ ही हनुमानगढ़ का कालीबंगा एैसे स्थल रहे है जो पुरासम्पदा के रूप में माटी की कला, मोहरे, मृदभाण्ड व मृणशिल्प आदि राज्य के पुरा कला वैभव की महता को रेखांकित करते हैं।

      मोलेला की मृणकला-

      राजसमन्द जिले के मोलेला गाँव की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान माटी से लोक देवी-देवताओं की हिंगाण (देवताओं की मूर्तियाँ) बनाने के रूप में हैं। मोलेला गांव नाथद्धारा से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मोलेला गांव का मृण शिल्प या कह सकते है टेराकोटा आर्ट विश्व प्रसिद्ध है। यहां के मृण शिल्पकार विविध प्रकार के लोक देवी-देवताओं का माटी में रूपांकन करते हैं, जिन्हें मेवाड़ के साथ ही गुजरात व मध्यप्रदेश की सीमाओं पर स्थित आदिवासी गांवों के लोग खरीदकर ले जाते हैं और गांव के देवरों में विधि विधानपूर्वक स्थापित कर कला से जुड़ी धार्मिक परम्परा का निर्वाह करते हैं। मोलेला में मृण शिल्प की पूरी प्रक्रिया मोल्ड का उपयोग किए बिना केवल हाथ से की जाती है।
      मोलेला के मृण कलाकारों द्वारा निर्मित हिंगाण कला में पारम्परिक व लोक तत्वों के साथ तकनीक की भी निजी विशेषता रही हैं जो पूर्ण रूपेण हॉफ रिलिफ में बनाए जाते हैं। पूर्णतया हस्तनिर्मित मोलेला की हिंगाण कला में चटकदार रंगों का प्रयोग कर रजत माली पन्नों से लोकानुरूप सुसज्जित कर परम्परा का निर्वाह किया जाता हैं। मोलेला की मृण कला से जुड़ा तथ्य यह हैं कि धार्मिक परम्पराओं के पालन के साथ रूपगत व रंगगत तत्वों को भी लौकिकता के साथ सहेज़कर रखा गया हैं। उल्लेखनीय हैं कि अपनी पारम्परिक कला के बलबूते यहां के कलाकार मोहनलाल कुम्हार को पद्मश्री से नवाजा गया है तथा सात-आठ मृणकलाकारों ने विदेशों में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन कर विश्वव्यापी पहचान बनाई। यहीं नहीं, मोलेला की परम्परा से प्रेरित होकर यूरोपिय देशों के 50 से ज्यादा कलाकार मोलेला के कुंभकारों के साथ मृण शिल्प का कार्य कर चुके हैं।

      गोगुन्दा की ब्लेक पॉटरी-

      गोगुन्दा के कुंभकार एक विशेष तकनीक से मृण पात्रों को पकाते हैं जिसके परिणामस्वरूप माटी के पात्र चमकदार स्याह रंग में दिखते हैं। आदिवासी बहुल उदयपुर जिले में गोगुन्दा ऐसा केन्द्र है जिसके चारों और आदिवासी गांवों की बसावट है तथा इसी कारण से यह स्थान आदिवासी समाज के प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र के रूप में भी पहचान रखता हैं। गोगुन्दा में आज भी कई कुंभकार माटी से जुड़ी कला परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं।
      गोगुन्दा के कुंभकार दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाले मृण पात्रों के साथ ही कृषि कर्म, तीज-त्यौहार पर विशेष मृण पात्रों को बनाते हैं। यहाँ के आदिवासी समाज आज भी अपने दैनिक उपयोग के बर्तनों के रूप में गोगून्दा में बने माटी के पात्रों को खरीद कर ही परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं। कुएं से जल निकालने का मृण पात्र ’’गेड’’ भी यहीं के कुंभकार बनाते हैं तथा मांगलिक व त्यौहारिक अवसरों के लिए छोटे-बड़े आकार के मृणपात्र बनाते हैं जिन्हें सफेद खड़ी एवं गेरू रंग से रंगाकित कर लयबद्ध बेलबूटों व लोकानुरंजित आकृतियों को रूपांकित करते हैं। इसी के साथ गोगुन्दा के मृण कलाकार केलडी (मिट्टी का तवा), भणाई, पारोटी (छोटी मटकी) , कुंजा, कुण्डी, परात, गिलास व लोटे के साथ ही माटी से ही भांति-भांति के सजावटी सामान भी बनाते हैं।
      मृण कला के इस क्रम में कुंवारिया में बने माटी के पात्रों के साथ ही एकलिंगजी, कुंभलगढ़, मातृकुण्डिया आदि स्थल भी मृण पात्रों के लिए पहचाने जाते हैं। कुंभलगढ़ व सायरा के मध्य स्थित बाघपुरा गांव में बसे कुंभकारों की विशेषता यह हैं कि वर्षों से वे सिर्फ माटी की केलड़ियों को ही बनाते हैं जिनकी बिक्री मेवाड़ तथा मारवाड़ के साथ ही गुजरात के गांवों में होती है। माटी से बनी व लकड़ी की आंच में पकी इन केलडियों व तवों को कुंभकार महिलाएं गेरू रंग से लयबद्ध रूपाकारों को रंगांकित कर पारम्परिक कला को संरक्षित कर रहे हैं।
      सिरोही व पिण्डवाड़ा के साथ ही बून्दी के समीप स्थित ठीकरदा, मारवाड़ा का नागौर व पोकरण ऐसे स्थल है, जहां की मृण कला में पारम्परिक कलारूपों के साथ पारम्परिकता का समावेश भी दिखाई देता हैं। पोकरण की मृणकला की पहचान 2 दशक पूर्व तक सिर्फ मारवाड़ भू-भाग तक ही फैली हुई थी किन्तु आज यहां की मृणकला न केवल देश भर में बल्कि यूरोपीय देशों तक अपनी पहचान व बाजार बना चुकी हैं।
      पोकरण की माटी में ठोस व चमकीला पन होने के कारण जो कला रूप बनते हैं, वो पकने के बाद अपनी अलग ही रंगत में दिखाई देते हैं। यहां मुख्यः घरेलू उपयोग के बर्तन, सजावटी उपादान के साथ ही भांति-भांति के खेल-खिलोने बनाने की परम्परा का निर्वाह आज भी हो रहा हैं। रामदेवरा से 10 किमी दूर जैसलमेर मार्ग पर स्थित पोकरण विविध आकार प्रकार व भांति-भांति के मृण पात्र बनाने की विशिष्ट परम्परा रही हैं जिनका उपयोग जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में बसे सभी समाज के लोगों द्वारा किया जाता हैं।

       पोकरण की मृण कला-

      पोकरण की मृण कला की खासियत यह भी हैं कि यहां के पुरूष कुंभकारों के साथ ही महिलाएं भी न केवल मृण पात्रों की रचना करती है अपितु रंगांकन तथा अलंकरण में भी इनका विशेष योगदान रहता है। केलडी व परात के साथ ही गुल्लक तथा भांति-भांति के खेल-खिलोनों को बनाने में भी महिलाएं सिद्धहस्त रही है। इन मृण पात्रों को लकड़ी के अवाडे में पारम्परिक तरीके से पकाने से पूर्व खडिया, गेरू, पीला व काले रंग से पारम्परिक शैली में अलंकरण व बेलबूटों का रूपांकन करते है। यहीं नहीं, खेल खिलौनों पर भी परम्परा के साथ नवीनता का समावेश दिखाई देता हैं। यहां की मिट्टी की विशेषता यह है कि लाल व कत्थई रंग की माटी से बने मृण पात्रों को जब लकड़ी की सहायता से पारम्परिक तरीके के अवाड़ा में पकाया जाता है तब पकने के बाद इन मृण पात्रों का रंग हल्के गुलाबी रंगत जैसा हो जाता है, जो इस माटी की विशेषता कहीं जा सकती हैं।
      पोकरण के मृण शिल्पकार मुख्यतः बडबेडा, खरल, परात, पारोटी, चाडा, पारा, मटकी, घड़ा, कुलडी आदि के साथ ही विविध पशु-पक्षियों की छोटी-बड़ी आकृतियां व भांति-भांति के अलंकृत गुल्लक बनते हैं। औजारों के रूप में देखें तो यहां के मृण कलाकार चॉक, हाथरी, घागा, पिण्डी, थापा, टुलकिया, कूंद, खुरपा, मंडाई आदि प्रयोग कर मृण से बने पारम्परिक कला रूपों को आकारित करते हैं।
      पोकरण के इस क्रम में नागौर, बालोतरा, धाणेराव की सादडी भी ऐसे स्थल है जहां आज भी मिट्टी से मटके, परात, सुराही, कुल्लड़ (सिकोरा), केलड़ी, लौटा आदि के साथ ही खेल खिलौने व सजावटी उपादान बनाए जाते हैं।

      रामगढ़ की चमकदार मृणकला -

      राजस्थान  में अलवर के समीप स्थित रामगढ़ गांव अपनी चमकदार मृणकला के लिए जगप्रसिद्ध रहा है तथा यहां के कुंभकार देश-विदेश में अपनी कला की तकनीक तथा रूपाकारों को प्रदर्शित कर विश्वव्यापी पहचान बना चुके हैं। रामगढ़ तो मृणपात्रों व मर्तबान आदि का प्रमुख केन्द्र हैं ही, समीप बंसे पीपरोली, नौगांवा, गूगदोड़, खानपुर, बगड राजपूत मुबारिकपुर आदि कुंभकारों के ऐसे गांव हैं जहां आज भी मृणकला परम्परा के विधि रूप प्रकार देखें जा सकते है तथा इनकी बिक्री आज भी हाट बाजारों में होती है व ग्रामीणजन आज भी माटी के पात्रों को प्रयोग करने के प्रति जागरूक है। यही कारण है कि यहां के मृणपात्रों का बाजार अलवर व भरतपुर के साथ जयपुर तक फैला हुआ है।
      मृण कला की खासियत उसकी मिट्टी में निहित होती है और यदि रामगढ़ की मिट्टी की बात करें तो यहां के कुंभकार सैंथली तथा सरेदा गांव की मिट्टी लाकर मृणपात्रों को बनाते हैं। सैथाली की काली मिट्टी में जहां चिकनाई तथा लचीलापन होता है अतः उससे बड़े आकार के सुराहीनुमा पात्रों को बनाया जाता है तथा इन्हें विशेष तकनीक से पकाकर स्प्रे जैसी तकनीक-सा प्रभाव पैदा किया जाता है। दूसरे प्रकार की माटी सरेठा गांव की होती है जो कुछ दानेदार होती है तथा इस मिट्टी से दैनिक उपयोग में प्रयोगित होने वाली विविध बर्तनों के साथ ही मटके, परात आदि बनाने में काम बाती हैं।
      यहां के मृण पात्रों में पारम्परिक कला तत्वों का समावेश दिखाई देता हैं तथा आज भी यहां के कुंभकार स्वनिर्मित औजारों का ही प्रयोग करते हैं तथा अवाडा पकाने में भी पारम्परिक तकनीक एवं लकड़िया ही उपयोग किया जाता है।
      रामगढ़ तथा आसपास बसे कुंभकार गांवों की विशेषता रही हैं कि दैनिक जीवन में उपयोग मृण पात्रों को बनाने की अनूठी परम्परा है। जल संग्रह व जल वितरण के साथ ही यहां के कुंभकार भोजन बनाने, पकाने व परोसने में काम आने वाले कलात्मक पात्रों को बनाते हैं तथा आज भी इनकी बाजार में भारी मांग बनी हुई है। उल्लेखनीय हैं कि यहां के कलात्मक मृणपात्र कई देशों तक में भेजे जा रहे हैं किन्तु पारम्परिक कलातत्व आज भी अपनी मौलिकता के साथ विद्यमान हैं।
      रूप, आकार व नाम के रूप में देखें तो रामगढ़ के कुंभकार मुख्यरूप से हांडी, सांदकी, घामला, कडकल्ला, कूंडी, कूंडा, चामली, चापटी, धीलडी, कढ़ावणी, बिलोवणी, तवा, सकोरा, कुल्लड़, करवा, कूलडा, कूलडी, झावा, सिराई, करी तथा झोलवा आदि मृण पात्रों की रचना करते हैं जो मुख्यतः भोजन पकाने, परोसने आदि से जुड़े रहें है। जल पात्रों के रूप में देखें तो यहां के कुंभकार मांग्या, तपक्या, तौलडी, मटका-मटकी, माट, झाल, मूण, सुराही, लोटिया, घड़ा व घडिया आदि को चाक पर बना कर परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं। इसी प्रकार त्यौहारिक व मांगलिक कार्यों में प्रयोगिक मृणपात्रों में दीपक, कलश, जेधड, धाथ की जेघड़, धूपेडा, नारियल तथा लघु भाग में देवी-देवताओं की मृण प्रतिमाएं बनाते हैं। इसी के साथ रामगढ़ में बने मिट्टी के खिलौने, तथा माटी से ही बने तासा, ढोलक, तबला, कूंडी, माट व नगारी आदि पारम्परिक वाद्ययंत्रों भी बेहद लोकप्रिय रहे हैं तथा आज भी इन्हें बनाने वाले कुंभकार जीविकोपार्जन के लिए मृण कला परम्परा को जीवित रखे हुए हैं।

      हाड़ौता गांव की माटी कला-

      जयपुर से सटे चौमूं कस्बे के समीप बसा हाड़ौता गांव की कलागत पहचान माटी की कला के रूप में रही है तथा आज भी यहां पारम्परिक मृणपात्रों को बनाने की परम्परा के विकसित रूप को देखा जा सकता है। प्रमुख रूप से यहां पर घरेलू उपयोग में आने वाले माटी के बर्तन तो बनते ही हैं, बड़े आकार के मृद भाण्ड व सजावटी उपादानों के लिए भी हाड़ौता के मृण कलाकार प्रसिद्ध रहे हैं। कहावत भी हैं कि हाड़ौता में दो ही चीजे प्रसिद्ध हैं- ऊँट लड्डे तथा माटी के बरतन।
      अपने को दक्ष प्रजापति का वंशज मानने वाले हाड़ौता के कुम्हार बर्तन बनाने के लिए समीप बसे गांव हथलोदा से लाल मिट्टी तथा जोबनेर के समीप कालरवा बांध तथा जीण माता के बंधे से काली व चिकनी माटी लाते हैं और उसे विधि पूर्वक तैयार कर माटी में भांति-भांति के रूपाकारों बनाते हैं। मोटे रूप में देखें तो अन्य कुंभकारों केन्द्रों की भांति यहां के कुंभकार भी मिट्टी बनाने व चॉक पर बर्तन बनाने की समान परम्परा का निर्वाह करते हैं किन्तु मृणपात्रों के आकार-प्रकार, पात्रों पर रूपांकित अलंकरण आदि में देशज तत्वों के साथ नवीनता के समावेश को देखा जा सकता हैं।
      हाड़ौता की कुंभकारी कला की यह विशेषता रही हैं कि यहां के कुंभकार कई ऐसे बर्तन बनाते हैं जिन्हें आधा तो चॉक पर उतारा जाता है तथा पैंदे के भाग को बाद में थापे-पिण्डी से घड़ कर मृण पात्र को पूर्ण रूप दिया जाता है। इसी प्रकार यहां के कुंभकार दो-तीन मृद भाण्डों को जोड़ कर उसे वृहदाकार रूप देने में भी सिद्धहस्त रहे है। यही कारण हैं कि हाड़ौता की माटी की कला को जयपुर व दिल्ली के साथ ही विदेशों तक में लौकिक पहचान मिली हैं। औजार के रूप में देखें तो यहां के कलाकार लोहे से बना सुवा, बंकी, कामडी, गिरारी, रेगमाल, फनर, पिण्डीथापा, हाथरी व नाली जैसे पारम्परिक व हस्तनिर्मित औजारों का प्रयोग कर माटी से जुड़ी कला परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। यहां के कुंभकार खडी भट्टी का उपयोग करते हैं तथा लकड़ी से आवा (अवाडा) पकाने के बाद उन माटी के बर्तनों आदि पर पलेवा पत्थर का लेप लगाकर सूखा देते हैं तथा खड़ी व गेरू रंग से पारम्परिक शैली में फूल-पत्तियों के अलंकरण से सजाते हैं।

      जयपुर की ब्लू पोटरी-

      ब्लू पोटरी मूलतः एक फ़ारसी कला है किन्तु इसको जयपुर का पारम्परिक शिल्प माना जाता है । बर्तन को रंगने में प्रयुक्त नील की वजह से ही इसे ब्लू पोटरी कहा जाता है। यह कला 14 वी शताब्दी में तुर्को द्वारा भारत लायी गई थी। जयपुर में इसे लाने का श्रेय यहाँ के राजा सवाई राम सिंह द्वितीय (1835 -1880 ) को जाता है। उन्होंने चूड़ामन तथा कालू कुम्हार को यह काम सीखने के लिए दिल्ली भेजा तथा उनके प्रशिक्षित होने पर जयपुर में इसकी शुरुआत करवाई। 1950 के दशक तक पूर्णतया विलुप्त हो चुकी इस कला को पुनर्जीवित करने का श्रेय प्रसिद्ध चित्रकार कृपाल सिंह शेखावत को जाता है जिन्हे पद्मश्री तथा शिल्पगुरु से सम्मानित किया जा चुका है। जयपुर के रामबाग पैलेस के फव्वारों पर आज भी इस कला का नमूना देखा जा सकता है। ब्लू पोटरी कला में सामग्री के रूप में क्वार्ट्ज़ पत्थर के पाउडर, मुल्तानी मिटटी, बोरेक्स, गोंद तथा पानी का प्रयोग किया जाता है। इससे बनने वाली वस्तुओ में खिलौने, सजावटी सामान, जार, कप, चाय का सेट, छोटे कटोरे, क्रॉकरी आदि बर्तन,ऐश ट्रे, आदि प्रमुख है।

      बीकानेर संभाग की मृण कला-  

      बीकानेर संभाग में नोहर क्षेत्र चित्रित मिट्टी के बर्तनों का उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, जहां लाख रंगों का उपयोग किया जाता है। बीकानेर के चित्रित मिट्टी के बरतन की सुनहरी आभा इसमें और अधिक आकर्षण पैदा करती है। सुनहरी टेराकोटा के लिए बीकानेर प्रसिद्ध है

      अलवर की कागजी पॉटरी-  

      राजस्थान का अलवर बहुत पतली मिट्टी के बर्तनों का उत्पादन करने में माहिर हैं जिसे कागजी पॉटरी के रूप में जाना जाता है।

      ब्लेक पॉटरी कोटा-

      कोटा की ब्लेक पॉटरी राजस्थान ही नहीं देश भर में प्रसिद्ध है । इसमें मृण कला का आधार काला होने के कारण यह ब्लेक पॉटरी कहलाती है। यह फूलदानों, प्लेटों और मटकों के लिए विशेष प्रसिद्ध है।

      इसके अलावा उदयपुर जिले के भुताला, मजावडी नामक स्थानों पर टेराकोटा कलाकृतियां तैयार की जाती है। दौसा जिले का बसवा अपने मृण कला के विविध प्रकार, आकार और अलंकरण वाले बर्तनों के लिए जाना जाता है। भरतपुर जिले का मेहटोली गांव अपनी मृत्तिका शिल्प के लिए प्रसिद्ध है हरजी ग्राम (जालौर) मे लोक देवताओं की घोड़े पर सवार मिट्टी से निर्मित मूर्तियां बनाई जाती है।

      Source- Shodhganga


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